24 घंटे करती क्या हो तुम...
एक सवाल, एक ताना, या एक अनदेखा सच?
“सारा दिन इस 24 घंटे तुम करती क्या रहती हो ?”
ये महज एक लाइन नहीं है, बल्कि समाज की उस सोच का आइना है जो आज भी एक हाउसवाइफ या होममेकर के योगदान को हल्के में लेता है।
जिस महिला का दिन सबसे पहले शुरू होता है और सबसे आख़िर में खत्म होता है, फिर भी उसी से पूछा जाता है — “तुम करती क्या हो?”
घर में सबसे पहले जागने वाली और सबसे आखिरी सोने वाली वो औरत — जब अपने कानो में ये सुनती है: ये सवाल न केवल उसके self respect को ठेस पहुंचाता है, बल्कि उसकी पूरी मेहनत को invisible बना देता है। उसका सारा का सारा टाइम फ्रेम ही सवालों के घेरे में आ जाता है।
एक ऐसा जुमला जो एक होममेकर के पूरे वजूद को चुनौती देता है।
वो महिला जो हर किसी की ज़रूरत को खुद से पहले रखती है
क्या वो सच में कुछ “नहीं करती?”
ये वो एपिक लाइन है जो शायद जाने कितने बरसों से इस्तेमाल की जा रही है इस सोसाइटी में।
फिर चलें पहले ये पता कर ही लें इन लाइन्स का रियलिटी चेक कर कि वाकई में हमारी सोसाइटी में होममेकर्स .या हाउसवाइफ कहलाने वाली ये वुमन आखिर दिन के 24 घंटे क्या करती हैं।
इसका जवाब हमें वो आंकड़े देंगे जो हमारे आपके बीच हुए कई सर्वेज के बाद सामने आए हैं। ।नेशनल लेवल और इंटरनेशनल लेवल दोनों ही जगह इंडियन वुमन का ये डेटा पब्लिक पोर्टल पर अवेलेबल है।

📊 आँकड़ों की ज़ुबानी सच्चाई
वो जो चुपचाप बहुत कुछ कह जाते हैं
देश और दुनिया के कई सर्वे सोसाइटी की इस रिवायती सोच के खिलाफ चीख कर कहते हैं —
होममेकर कोई काम नहीं करती, ये कहना सबसे बड़ा झूठ है।
- 🔹 NSSO सर्वे (भारत):
एक एवरेज इंडियन वुमन रोज़ 297 मिनट (औसतन 5 घंटे ) किचन और हाउसहोल्ड वर्क में बिताती है, जबकि पुरुष सिर्फ 30 मिनट बमुशिकल ही किचन या दूसरे हाउसहोल्ड वर्क में ऐगेंज हो पाते हैं।
🔹 Mint रिपोर्ट: ये रिपोर्ट कहती है कि
एक इंडियन मैरिड वुमन दिन के 3.5 से 4 घंटे सिर्फ अपनी फैमिली की कुकिंग एंगेजमेंटस में ही बिता देती है।
वहीं पुरुष मात्र 4–10 मिनट ही । कितनी हैरानी की बात है।
- ILO रिपोर्ट (2024-25)
भारत की 53% महिलाएं प्रोफेशनल करियर औऱ फॉर्मल वर्कफोर्स से बाहर सिर्फ इसलिए हैं क्योंकि उन्होंने उसके उपर अपनी फैमिली और हाउसहोल्ड ऐगेंजमेंट को चुना है।यानि अपनी फैमिली और केवल पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के चलते उन्हें अपनी जॉब छोड़नी पड़ी या फिर वो कर न सकी, एक रियल फैक्ट है.
🔹 18–55 उम्र वर्ग की महिलाएं:
60% फुल टाइम हाउसवर्क में हैं, जिनमें से उनके 80% वर्किंग आवर्स अनपेड होते हैं।
इतनी एजुकेटेड हो..कोई जॉब ही कर लो…
अब तो इसमें एक और नई चीज जुड़ गई है वो है खुद दूसरी वर्किंग वुमन भी उनसे यही दोहराती है कि क्या सच में तुम हाउस वाइफ बन कर ही रहना चाहती हो। क्या मतलब जो होममेकर्स अपने घऱ और फैमिली के लिए ये डिसीजन लेती हैं . क्या वो अपने लिए कुछ भी नहीं कर सकती।तो क्या वो सारी की सारी फीमेल्स एमबिशस नहीं हैं और अपनी एजुकेशन वेस्ट कर रही है जो बीते कई सालों में उन्होने ली होगी। वो सब एक स्क्रैप है।जिसकी अब कोई वैल्यू नहीं।
वर्किंग वुमन की बात आते ही हमें करियर, स्किल,और प्रोग्रेस दिखाई देती है।

लेकिन एक होममेकर की बात होते ही सवाल उठते हैं —
“कुछ करती क्यों नहीं?”,
“इतनी पढ़ी-लिखी हो फिर भी जॉब नहीं?”
क्या घरेलू महिला का काम काम नहीं है?
क्या अपने परिवार, बच्चों और घर की जिम्मेदारी उठाना कोई छोटा काम है?
ये सच है कि हर की अलग अलग कैपेबिलिटीज होती हैं.मगर करते तो सभी कुछ न कुछ हैं।
पर जब हाउस वाइफ या होममेकर्स की बात होती है तो एक मीडियोकर फीलिंग से उसे कंपेयर किया जाता है।
- एक वर्किंग वुमन को घर और ऑफिस दोनों में बैलेंस करना होता है, मगर उनके पास अक्सर कोई न कोई सपोर्ट सिस्टम होता है।
- होममेकर वुमन के पास ना ऑफिस होता है, ना सैलरी, ना छुट्टियाँ। फिर भी उनका दिन पूरा “वर्कलोड” से भरा होता है — बिना वेतन, बिना मान्यता।
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क्या हाउस जॉब गुलामी है?
नहीं! ये एक चॉइस है।
ये एक पूरी तरह से समर्पित प्रोफेशन, जो घर की नींव बनाता है.
हाउस जॉब एक ऐसा काम जो तब तक नोटिस नहीं होता जब तक कि चलते चलते किसी एक दिन रुक जाए और जब वो काम नहीं हो पाता है तब जाकर ये नोटिस होता है कि हां ये काम भी है जो एक बैकग्राउंड में चलता रहता है
फिर समाज का ये सौतेलापन क्यूं और खुद उसी कमियूनिटी का वो बिहेवियर जो अपनी ही जैसी किसी दूसरी नारी को कॉम्पलेक्स फील कराने में कोई कसर बाकी नहीं रखती।
काम को “क्लास” में मत बांटिए
अगर कोई महिला जॉब करती है, तो उसे “सक्सेसफुल” कहा जाता है।
अगर कोई महिला घर संभालती है, तो उसे “बेचारा”, “बेकार”, या “नॉन-प्रोडक्टिव” समझ लिया जाता है।घर के काम सिर्फ “ड्यूटी” नहीं, एक फुल-टाइम, हाई-रेस्पॉन्सिबिलिटी जॉब है, जिसे कोई “सैलरी स्लिप” नहीं नाप सकती।
दोनों के पास अपने-अपने सपने, त्याग और संघर्ष हैं। कोई भी रास्ता आसान नहीं होता। फर्क सिर्फ समाज की नज़र का होता है।
हाउस जॉब कोई ऐसा प्रोफेशन नहीं जिसे किसी प्राइस टैग के साथ जोड़ दिया जाए और न प्रोफेशनली वर्किंग होना कोई सुपिरियर होने की फीलिंग है।
होममेकर ≠ इनफीरियर | वर्किंग वुमन ≠ सुपीरियर
अगली बार कहने से पहले रुकें और सोचें…
“तुम करती क्या हो सारा दिन?”
शायद जवाब है:
“सब कुछ, बस बताया नहीं जाता…”
समाज को अपना नजरिया बदलने की जरूरत है
- किसी भी महिला से ये न कहें — “तुम करती क्या हो?”
- उसकी मेहनत को मानें, सराहें और स्वीकार करें।
- होममेकर्स को सिर्फ “नॉन वर्किंग” समझने की सोच को बदलें।
क्योंकि…
“जिस दिन उसका किया काम रुक जाए, उसी दिन सबको समझ आएगा कि वो क्या करती थी सारा दिन।”
सलाम है ‘घर नारी’ को…
जो बिना थके, बिना शिकायत के,
अपने सपनों को होल्ड पर रखकर,
घर को संवारे रखती है,
परिवार को संभाले रखती है,
और फिर भी अक्सर पूछा जाता है — 24 घंटों में करती क्या हो तुम सारा दिन?
अंत में सिर्फ एक बात —
हाउस जॉब कोई गुलामी नहीं… यह एक समझदारी भरी चॉइस है।
और यह चॉइस भी उतनी ही गर्व की है, जितनी किसी ऑफिस की कुर्सी पर बैठना।
इसलिए प्यार से कहें..
You are the heart of this home. Thank you.