NEET क्यूं नही है NEAT
हर साल जब NEET का फॉर्म निकलता है, तो ऐसा लगता है जैसे पूरे देश में एक ही सपना बचा है — “डॉक्टर बनना।”
22 लाख से ज़्यादा बच्चे एक ही एग्जाम के पीछे भागते हैं। कोचिंग सेंटर भरे रहते हैं, हॉस्टल्स में नींद गायब रहती है, और घरों में सिर्फ एक ही बात सुनाई देती है — “ बस इस बार सिलेक्शन हो जाए। ”
लेकिन एक सवाल है जो बहुत कम लोग पूछते हैं —
क्या ये 22 लाख बच्चे सच में डॉक्टर बनना चाहते हैं?
या फिर उन्हें धीरे-धीरे एक ऐसी भीड़ का हिस्सा बना दिया गया है, जहाँ रुकना, सोचना और खुद से पूछना भी गुनाह जैसा लगता है। और फिर उन्हें एक ऐसी रेस में धकेल दिया गया है जहां सपने से ज्यादा डर का माहौल है उन नाजुक कंधों पर.
सच कहें तो इस देश में मेडिकल सिर्फ एक करियर नहीं रहा, बल्कि “स्टेटस सिंबल ”, “सेक्योरिटी ” और “ इज्जत ” का दूसरा नाम बन गया है।
बहुत सारी फैमिलीज में आज भी यही माना जाता है कि अगर बच्चा डॉक्टर बन गया, तो जिंदगी सेट हो गई।
चाहे बच्चे का इंटरेस्ट कहीं और हो, उसकी केपेसिटी अलग हो, उसका अकैडेमिक बिहेवियर अलग हो — लेकिन सपना वही रहेगा जो सोसाइटी ने उसके लिए तय किया है।
सबसे दर्दनाक बात ये है कि जब पेरेंटस अपने बच्चों को सबसे बेहतर जानते हैं।
उन्हें पता होता है कि उनका बच्चा किस चीज़ में अच्छा है, कहाँ कमजोर पड़ता है, किस माहौल में खुश रहता है। किस फील्ड में बेहतर परफॉर्म कर सकता है ,फिर भी अचानक एक दिन पूरा घर बदल जाता है।
दीवारों पर टाइम टेबल लग जाते हैं, मोबाइल बंद हो जाता है, रिश्तेदारों से मिलना कम हो जाता है, और बच्चे की पहचान सिर्फ एक रोल नंबर में बदलने लगती है।
कई घरों में तो ऐसा माहौल बना दिया जाता है जैसे NEET सिर्फ एक एग्जाम नहीं, बल्कि जिंदगी और मौत का फैसला हो।
सुबह कोचिंग।
दिनभर टेस्ट।
रात में guilt।
और हर वक्त comparison।
“शर्मा जी का बेटा 650 ला रहा है…”
“तुम्हारा दोस्त दूसरे attempt में निकाल गया…”
“इतना पैसा लगा रहे हैं, कुछ तो करो…”
धीरे-धीरे बच्चा पढ़ाई से ज्यादा डर पढ़ने लगता है।
सबसे बड़ी परेशानी ये है कि इस भीड़ में शामिल बहुत सारे बच्चों को खुद भी नहीं पता होता कि वो सच में डॉक्टर बनना चाहते हैं या नहीं।
क्योंकि हमारे यहाँ बच्चों को अपने बारे में सोचने का टाइम ही कहाँ दिया जाता है?
10वीं के बाद सीधे stream तय।
फिर coaching।
फिर mock tests।
फिर attempts।
किसी ने ये नहीं पूछा कि:
- तुम्हें लोगों के साथ काम करना पसंद है ?
- तुम्हें biology सच में interesting लगती है ?
- तुम mentally इतने लंबे pressure को संभाल पाओगे ?
- क्या तुम एक ऐसी profession के लिए तैयार हो जहाँ पूरी जिंदगी जिम्मेदारी और stress रहेगा ?

हमारे education system में career guidance से ज्यादा “career pressure” मिलता है।
और फिर आती है coaching industry।
आज NEET सिर्फ एक exam नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ा business बन चुका है।
हर शहर में बड़े-बड़े posters लगे होते हैं —
“हमारे institute से इतने selections।”
“AIIMS topper यहीं से।”
“Drop लेकर सपना पूरा करें।”
कोई ये नहीं बताता कि हजारों बच्चे उन्हीं हॉस्टलों में anxiety, loneliness और failure से भी लड़ रहे होते हैं।
कई बच्चे दो-दो, तीन-तीन साल drop लेते हैं।
उनकी उम्र बढ़ती जाती है, confidence कम होता जाता है, लेकिन समाज उन्हें रुकने नहीं देता।
क्योंकि हमारे यहाँ direction बदलना कमजोरी माना जाता है।
अगर कोई बच्चा कह दे कि उसे medical नहीं करना, तो सबसे पहले सवाल उठता है —
“फिर करेगा क्या?”
जैसे दुनिया में डॉक्टर और engineer के अलावा बाकी सारे काम बेकार हों।
असल में प्रॉब्लम सिर्फ NEET नहीं है।
प्रॉब्लम वो collective mindset है जिसमें हमने सक्सेस की definition बहुत छोटी कर दी है।
एक बच्चा जो अच्छा writer बन सकता था, वो biology रट रहा है।
जो designer बन सकता था, वो coaching modules solve कर रहा है।
जो teacher बनकर हजारों बच्चों की जिंदगी बदल सकता था, वो खुद depression में जा रहा है क्योंकि उसका selection नहीं हुआ।
और दुख की बात ये है कि इस पूरे सिस्टम में failure सिर्फ बच्चे का माना जाता है।
कोई ये नहीं देखता कि शायद ये सपना ही उसका कभी था ही नहीं।
ऊपर से exam की fairness को लेकर हर साल सवाल उठते हैं।
Paper leak, grace marks, mismanagement, court cases —
बच्चों को ये तक भरोसा नहीं रहता कि जिस exam के लिए वो अपनी teenage sacrifice कर रहे हैं, वो process भी पूरी तरह fair होगी या नहीं।
फिर भी लाखों बच्चे उसी लाइन में खड़े रहते हैं।

क्यों?
क्योंकि डर बहुत बड़ा है।
डर कि अगर doctor नहीं बने तो लोग क्या कहेंगे।
डर कि parents disappointed हो जाएंगे।
डर कि society उन्हें “average” मान लेगी।
हमारे सोसाइटी ने बच्चों को सपने कम और डर ज्यादा दिए हैं।
लेकिन शायद अब वक्त है कुछ सवाल ईमानदारी से पूछने का।
क्या हर intelligent बच्चा doctor ही बनेगा?
क्या हर मेहनती बच्चा NEET clear कर सकता है?
क्या एक exam किसी इंसान की पूरी value तय कर सकता है?
और सबसे जरूरी —
क्या बच्चों को अपनी जिंदगी चुनने का हक सच में मिला हुआ है?
सच्चाई ये है कि हर बच्चा डॉक्टर बनने के लिए पैदा नहीं होता।
और इसमें कोई शर्म नहीं है।
कोई बच्चा business में अच्छा होगा, कोई art में, कोई technology में, कोई teaching में, कोई sports में।
हमारा समाज तब healthy बनेगा जब हम professions की नहीं, इंसानों की काबिलियत की इज्जत करना सीखेंगे।

NEET निकाल लेना एक बड़ी कामयाबी हो सकती है।
लेकिन सिर्फ NEET न निकाल पाना कोई फेलियर नहीं है।
हर बच्चे को ये सुनने की जरूरत है कि उसकी जिंदगी की कीमत किसी cutoff से तय नहीं होती।
और हर parent को ये समझने की जरूरत है कि बच्चों पर सपने थोपने और उन्हें सपने देखने देने — दोनों में बहुत फर्क होता है।