Motivation and Reality
Motivation and Reality : हर दिन मोटिवेशन सुनने से मंज़िल नहीं मिलती, लेकिन शायद सही मोटिवेशन हमें अपने Dreams को पाने में मदद कर सकता है।
आज की डेट में हर तरफ मोटिवेशन है। इंटरनेट खोलिए तो मोटिवेशनल वीडियो, Podcast, रील्स और Success stories दिखाई देती हैं। सुबह घर पहुंचने वाले अखबार के किसी पन्ने पर भी कहीं न कहीं कोई मोटिवेशनल स्टोरी पढ़ने के लिए मिलती है। सोशल मीडिया की टाइमलाइन पर स्क्रॉल करते हुए अचानक कोई ऐसी कहानी सामने आ जाती है, जो कुछ सेकंड के लिए हमें रोक देती है।
हम या तो अपने फोन पर स्क्रॉल करते हुए कभी-कभी उस खास स्टोरी पर रुक जाते हैं और फिर मन उसी direction में आगे निकल जाता है। हम उस कहानी के किरदार का कुछ हिस्सा अपने आप के अंदर तलाशने की कोशिश करते हैं और कहीं न कहीं कुछ देर के लिए एक अजीब सी फीलिंग का एहसास होता है कि—हां, शायद ऐसा करें तो वैसा हो सकता है, जैसा हमने सोचा है।
और फिर कुछ देर तक वो इमोशन हमें एनर्जी से भर देता है।
लगता है शायद हमारा अप्रोच गलत है। हमें इस तरह करना चाहिए, जैसा कि इस वीडियो में ये मोटिवेशनल स्पीकर बता रहे हैं। शायद हमें सुबह जल्दी उठना चाहिए। शायद हमें अपना फोन छोड़ देना चाहिए। शायद हमें अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकलना चाहिए। शायद हमें बस एक फैसला लेने की जरूरत है और हमारी जिंदगी बदल सकती है।उस वक्त ऐसा लगता है कि रास्ता बहुत साफ है।लेकिन फिर कुछ देर बाद रियलिटी चेक मिलता है।

जो इंस्टेंट मोटिवेशन अभी-अभी मिला था, वो धीरे-धीरे धुंधला पड़ने लगता है। कई बार ऐसा होने में कुछ दिन लगते हैं और कई बार तो कुछ घंटों में ही मोटिवेशन का वो बुलबुला फूट जाता है।
फिर वही पुरानी जिंदगी। वही काम।वही जिम्मेदारियां।
वही थकान।वही डर।वही उलझन।और वही सवाल—अब आगे क्या?
मोटिवेशन का डोपामाइन ,
मोटिवेशन हमें बुरा महसूस नहीं कराता, बल्कि कई बार बहुत अच्छा महसूस कराता है। किसी की सक्सेस की कहानी सुनकर हमारे अंदर उम्मीद पैदा होती है। हमें लगता है कि अगर कोई मुश्किलों से निकलकर अपनी मंजिल तक पहुंच सकता है, तो शायद हम भी पहुंच सकते हैं।यही मोटिवेशन की खूबसूरती है।लेकिन प्रॉब्लम तब शुरू होती है जब हम मोटिवेशन को ही अपनी मेहनत का ऑपशन समझने लगते हैं। एक वीडियो देखना आसान है। एक पॉडकास्ट सुनना आसान है। किसी के लाइफ स्ट्रगल से इंन्फलूएंस होकर कुछ मिनटों के लिए खुद को उसी कहानी का हिस्सा महसूस करना भी आसान है।
मुश्किल है उस इमोशन को अगले दिन भी साथ लेकर उठना।
मुश्किल है तब काम करना, जब कोई हमें देखने वाला न हो।मुश्किल है तब भी कोशिश करना, जब पिछले दस attempts फेल हो चुके हों।
मुश्किल है उस दिन भी अपनी पढ़ाई, नौकरी, बिजनेस, ऑर्ट या किसी दूसरे ड्रीम के लिए कोशिश, जिस दिन मन बिल्कुल नहीं कर रहा हो।
यहीं मोटिवेशन और डिसिप्लिन के बीच का फर्क सामने आता है।
हम दूसरों की कहानी में अपना अधूरा हिस्सा क्यों तलाशते हैं ?

ऐसा ही कई दफा अखबार के पन्ने पलटते हुए कुछ खास स्टोरीज पर नजर खुद-ब-खुद रुक जाती है। कुछ लम्हों के लिए वो कहानी जानी-पहचानी लगती है, जैसे उस कहानी का कुछ हिस्सा हमने भी जिया है।जी हां, ये सच है और ऐसा लाइफ में कई बार होता है।हम सबकी स्टोरीज अलग-अलग हैं जरूर, मगर हर कहानी के कुछ हिस्से कॉमन होते हैं, जो शायद एक ही वक्त में इस पूरी दुनिया में कई लोग एक साथ जी रहे होते हैं।और जब हमें ऐसी कहानी मिलती है, तो हम उसमें अपना कोई पुराना दर्द, कोई अधूरा सपना या कोई दबा हुआ सवाल देख लेते हैं।शायद इसीलिए इंस्पिरेशनल स्टोरीज हमें अट्रैक्ट करती हैं।
हर अचीवर की कहानी सुनना जरूरी नहीं कि हमारी जिंदगी का नक्शा भी बन जाए
यहां कहना यह है कि हमारी सोसाइटी इंस्पिरेशनल और मोटिवेशनल स्टोरीज से भरी है।यहां हर अचीवर के पास दुनिया को अपना स्ट्रगल बताने के लिए एक चांस मिलता है और कोई न कोई मोटिवेशनल स्पीकर ये कहानी सारी दुनिया के सामने रखता है।लेकिन हमें एक बात समझनी होगी—किसी की सक्सेस स्टोरी उसकी जिंदगी का तजुर्बा है, जरूरी नहीं कि वो हमारी जिंदगी का फार्मूला भी हो।
किसी ने रात में चार घंटे सोकर कामयाबी हासिल की, इसका मतलब यह नहीं कि हर इंसान को चार घंटे सोना चाहिए।
किसी ने नौकरी छोड़कर बिजनेस शुरू किया और सक्सेसफुल हो गया, इसका मतलब यह नहीं कि हर को नौकरी छोड़ देनी चाहिए।
हर इंसान की फैमिली अलग है। फाइनेंशियल कंडीशन अलग है। जिम्मेदारियां अलग हैं। प्रॉयोरिटीज अलग हैं।
और सबसे बड़ी बात—हर इंसान की मेंटल और सोशल सिचुएशन अलग हैं।इसलिए किसी दूसरे की कहानी को अपनी जिंदगी का कमांड मान लेना सही नहीं है।
मोटिवेशन का ओवरडोज भी क्या एक परेशानी है?
मगर बीते कुछ दिनों में हर प्लेटफॉर्म—चाहे वो ऑनलाइन हो या ऑफलाइन, जो भी पब्लिक डोमेन में है—वहां ऐसे मोटिवेशनल स्पीच और इस तरह की स्टोरीज काफी आने लगी हैं।कहा जाए तो एक तरह से मोटिवेशन और इंस्पिरेशन का ओवरडोज मिलने लगा है।कभी-कभी जो समझ में आता है और कभी तो ये माइंड के ऊपर से निकल जाता है। फिर भी एक आदत सी बन जाती है ऐसी स्टोरीज पढ़ने की, सुनने की और देखने की।और कभी-कभी उन पूरी हो चुकी कहानियों में अपनी लाइफ की अधूरी कहानी ढूंढने की।
सुबह एक मोटिवेशनल वीडियो।दोपहर में किसी का इंटरव्यू।शाम को पॉडकास्ट।
रात में कोई रील—“अगर जिंदगी बदलनी है तो ये पांच काम आज से शुरू कर दो।” और फिर अगले दिन एक और वीडियो।
धीरे-धीरे ऐसा भी हो सकता है कि हम काम करने से ज्यादा काम करने के बारे में कंटेंट देखने लगें।
हम प्रोडक्टिविटी पर दस वीडियो देख लेते हैं, लेकिन जिस काम को करना था, वह वहीं पड़ा रहता है।
हम डिसिप्लिन पर पॉडकास्ट सुनते हैं, लेकिन अगले दिन अलार्म बजने पर फिर वही पुरानी आदत वापस आ जाती है।
यानी जानकारी और एक्शन के बीच एक बहुत बड़ा फासला बन जाता है।
क्या हमें मोटिवेशन की जरूरत नहीं है ?
कभी-कभी जिंदगी में एक छोटा सा धक्का भी बहुत जरूरी होता है। कोई कहानी हमें उस वक्त संभाल सकती है, जब हम खुद को बहुत अकेला महसूस कर रहे हों। किसी की जर्नी हमें याद दिला सकती है कि नाकामी जिंदगी का आखिरी पड़ाव नहीं है।मोटिवेशन हमें अपनी किसी पॉसिबिलिटी की तरफ देखने के लिए मजबूर कर सकता है।कई बार हम सिर्फ इसलिए आगे नहीं बढ़ते क्योंकि हमें लगता है कि अब कुछ बदल नहीं सकता।ऐसे वक्त में किसी दूसरे इंसान की कहानी यह एहसास करा सकती है कि बदलाव मुमकिन है। मगर मोटिवेशन मंजिल नहीं है। मोटिवेशन शायद रास्ते पर पहला कदम हो सकता है।
असली बदलाव उस वक्त शुरू होता है जब कैमरा बंद हो जाता है

मोटिवेशनल वीडियो में अक्सर लाइफ स्ट्रगल एक कहानी है।लेकिन असल जिंदगी में स्ट्रगल कहानी नहीं होता,वह बिखरा हुआ होता है।कई बार उसमें कोई बैकग्राउंड म्यूजिक नहीं होता।कोई हमें नहीं बताता कि अब अगला कदम क्या है।कोई तालियां नहीं बजाता।कई बार हमारा रिजल्ट महीनों या बरसों तक नहीं आता।यही वो हिस्सा है, जो मोटिवेशनल वीडियो में कुछ मिनटों में खत्म हो जाता है, लेकिन असली जिंदगी में शायद सबसे ज्यादा टाइम लेता है।किसी की सक्सेस देखकर हमें उसकी मंजिल दिखाई देती है। उसका वह वक्त नहीं दिखाई देता, जब उसे खुद नहीं पता था कि वह सही डॉयरेक्शन में जा रहा है या नहीं।
हम उसकी अचीवमेंट देखते हैं, उसकी मुशिकलें नहीं।
हम उसकी ट्रॉफीज देखते हैं, उसकी रोजमर्रा की बोरियत नहीं।
हम उसका इंटरव्यू देखते हैं, वो सैकड़ों दिन नहीं देखते जब शायद उसने बिना किसी तारीफ के अपना काम जारी रखा होगा।
शायद इसलिए किसी की कहानी से इंफ्लूएंस होने के साथ-साथ यह समझना भी जरूरी है कि कहानी का सबसे मुशिकल हिस्सा अक्सर कैमरे के बाहर होता है।
हमारी जिंदगी का पेपर अलग है ,सच तो यही है कि हर किसी की लाइफ का पेपर अलग है और उसकी सिचुएशन भी।
कौन सी कहानी किसको काम आएगी, कहना मुश्किल है।फिर भी उम्मीद पर दुनिया कायम है।
शायद मोटिवेशन की असली खासियत यही है—हमें किसी कामयाब इंसान की कॉपी नहीं बनना है।हमें उसकी कहानी से अपने लिए कोई एक छोटी सी सीख चुननी है।अगर किसी इंस्पिरेशनल स्टोरी ने हमें सिर्फ इतना याद दिलाया कि अभी सब खत्म नहीं हुआ है, तो शायद उसका काम वहीं पूरा हो गया।हर मोटिवेशन हमें जिंदगी बदलने वाला बड़ा फैसला लेने के लिए नहीं आता।कभी-कभी वह सिर्फ हमें अगले दिन तक टिके रहने की वजह देता है।
शायद हमें मोटिवेशन से ज्यादा डॉयरेक्शन की जरूरत है आज के दौर में प्रॉब्लम यह नहीं है कि हमारे पास मोटिवेशन की कमी है।शायद यह है कि हमारे पास मोटिवेशन बहुत ज्यादा है और डॉयरेक्शन कम।हमें हर दिन बताया जा रहा है कि हमें क्या बनना चाहिए, कितना काम करना चाहिए, सुबह कितने बजे उठना चाहिए और जिंदगी को किस तरह बदल देना चाहिए।
लेकिन कम ही जगह यह बातचीत होती है कि — हम असलियत में चाहते क्या हैं?
हमारे लिए सक्सेस का मतलब क्या है ? क्या हम सच में वही जिंदगी चाहते हैं, जिसे सोशल मीडिया सक्सेसफुल लाइफ कह रहा है?
मोटिवेशन को इस्तेमाल करें, उस पर डिपेंड न करें।

शायद सही तरीका यह है कि हम मोटिवेशनल कंटेंट को अपनी जिंदगी का फ्यूल तो बनाएं, लेकिन पूरा इंजन नहीं।
किसी कहानी से कनेक्ट हों ।किसी पॉडकास्ट से कुछ सीखें।किसी के स्ट्रगल से उम्मीद लें।
लेकिन फिर फोन नीचे रखें।कुछ देर चुप बैठें। औरअपनी लाइफ को देखें।
क्योंकि आखिरकार जिंदगी मोटिवेशनल कोट्स से नहीं बदलती।
जिंदगी उन छोटे-छोटे कामों से बदलती है, जिन्हें हम बार-बार करते हैं।
कभी मन लगाकर।कभी बिना मन के।
कभी उम्मीद के साथ।कभी बिना किसी उम्मीद के।
और कभी सिर्फ इसलिए क्योंकि हमने तय किया है कि आज भी थोड़ा आगे बढ़ना है।
क्योंकि Dreams के करीब पहुंचने के लिए हर दिन किसी बड़े मोटिवेशन की जरूरत नहीं होती।
किसी और की कहानी हमें रास्ता दिखा सकती है, लेकिन हमारी जिंदगी का रास्ता हमें खुद ही तय करना होगा।
और शायद यही वजह है कि मोटिवेशन सुनते रहना गलत नहीं है—लेकिन मोटिवेशन को अपनी जिंदगी में उतारना उससे कहीं ज्यादा जरूरी है।क्योंकि सवाल यह नहीं है कि हमने कितनी मोटिवेशनल कहानियां सुनीं।सवाल यह है कि उन कहानियों में से कितनी बातें हमने अपनी जिंदगी में उतारीं।शायद Dreams और Reality के बीच की दूरी मोटिवेशन से नहीं, बल्कि उस छोटे से कदम से कम होती है जो हम मोटिवेशन खत्म हो जाने के बाद भी उठाते रहते हैं।
यह भी पढ़ें। Over Night Success : Smart work के सामने फीका पड़ता Hard Work ??