घूप ,धूल औऱ मेल - फीमेल...
धूप, धूल… और मेल-फीमेल
बस में बैठिए। किसी लंबी Journey पर निकलिए। जैसे ही वो बस किसी चौराहे, ढाबे या रेलवे क्रॉसिंग पर कुछ मिनटों के लिए रुकती है, अचानक एक अलग दुनिया आपके सामने आ जाती है। कोई मूंगफली बेच रहा है। कोई चना। कोई गर्म भुट्टे लेकर भागता हुआ हर खिड़की तक पहुँचने की कोशिश कर रहा है। कोई ठंडे पानी की बोतलें लिए आवाज़ लगा रहा है—”ठंडा पानी… ठंडा पानी…”
बस कुछ मिनट रुकती है। लेकिन उन लोगों के लिए वही कुछ मिनट पूरे दिन की कमाई तय कर सकते हैं।
अब ज़रा एक पल रुककर देखिए।
इस पूरी भीड़ में कितनी महिलाएँ हैं?
मुमकिन है कि एक-दो दिख जाएँगी कहीं न कहीं। लेकिन ज्यादातर जगहों पर आपको ज़्यादातर पुरुष ही दिखाई देंगे।
यही नजारा रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, ट्रैफिक सिग्नलों, सब्ज़ी मंडियों, कंस्ट्रक्शन साइट्स और शहरों की धूल भरी सड़कों पर भी दिखाई देता है।
ईंट कौन ढो रहा है ?
सीमेंट की बोरियाँ कौन उठा रहा है ?
तेज़ धूप में डामर की सड़क कौन बिछा रहा है ?
चालीस-पैंतालीस डिग्री टेंपरेचर में ट्रक कौन चला रहा है ?
रात भर बस कौन दौड़ा रहा है ?
सड़क किनारे पंचर कौन बना रहा है ?
बिजली के खंभे पर जान जोखिम में डालकर कौन चढ़ा हुआ है ?

इतने सारे सवालों का जवाब हर जगह एक जैसा नहीं होगा, लेकिन एक बात है जो बेहद साफ़ साफ दिखेगी— इन सारे कामों में पुरुषों की तादाद बहुत ज्यादा है।
फिर भी जब सोसाइटी में स्त्री-पुरुष की डिबेट होती है, तो अक्सर तस्वीर का केवल एक हिस्सा सामने आता है।
ऐसा क्यों होता है ?
क्योंकि आजकल हम स्ट्रगल को भी अपनी आसानी के मुताबिक देखने लगे हैं।
आज सोशल मीडिया पर एक कॉमन मेंटलिटी तेजी से फैलती है कि पुरुषों के पास स्पेशल राइट्स हैं और महिलाएँ सिर्फ स्ट्रगल करती हैं।
लेकिन क्या ज़िंदगी सचमुच इतनी सीधी सपाट है ?
अगर ऐसा ही मुमकिन होता, तो बस की खिड़की के बाहर धूप में दौड़ते वे लोग कौन हैं ?

यदि मर्दों के खास अधिकार ही सब कुछ तय करते, तो सबसे जोखिम भरे और सबसे कम मेहनताना पाने वाले कामों में पुरुषों की इतनी बड़ी संख्या क्यों दिखाई देती ?
यह सवाल किसी का किसी के साथ कम्पैरिजन करने के लिए नहीं, बल्कि सोसाइटी की पूरी तस्वीर देखने के लिए है।
दरअसल, समाज ने पुरुष और महिला—दोनों के लिए अलग-अलग भूमिकाएँ गढ़ी हैं।
बचपन से लड़कों से कहा जाता है—मजबूत बनो।
रोना नहीं। डरना नहीं।
कमाना है। घर चलाना है।
ज़िम्मेदारी उठानी है।
और अगर नाकाम हुए तो सबसे पहले सवाल भी तुमसे ही होगा।
यह दबाव केवल फाइनेंशियल ही नहीं होता। यह मानसिक भी होता है।
एक आम आदमी सुबह घर से निकलते टाइम यह नहीं जानता कि शाम तक कितनी कमाई होगी।
लेकिन वह बाहर निकलता ही है। क्योंकि उसे पता है कि घर में बच्चों की फीस है।
बिजली का बिल है। दवा खरीदनी है।राशन लाना है।
और शायद किसी को उसके इस हर दिन के स्ट्रगल से कोई मतलब भी नहीं होगा।
अब दूसरी तरफ़ आइए।
तो क्या महिलाएँ स्ट्रगल नहीं करतीं ? इसका जवाब है ,बिल्कुल करती हैं।
जो महिला नौकरी करती है, वह दफ़्तर और घर— दोनों की जिम्मेदारियों के बीच बैंलेस बनाती है।
जो हाउस वाइफ है, उसका काम अक्सर बिना सैलरी और बिना छुट्टी का होता है।
गाँवों में खेतों में काम करने वाली महिलाएँ भी कम मेहनत नहीं करतीं। यह सब उतना ही सच है जितना बस के बाहर दौड़ता हुआ वह फेरीवाला।
लेकिन एक सवाल यहाँ इस सिचुएशन भी बनता है।
क्या हर महिला जो घर में है, वह सिर्फ अपनी मजबूरी में है ? शायद नहीं।
यह बात कहना कुछ लोगों को परेशान कर सकता है, लेकिन रियल लाइफ हमेशा किसी नारे जितनी सिम्पल नहीं होती।
आज लाखों वेल एजुकेटेड महिलाएँ ऐसी हैं जिनके सामने जॉब करने के मौके मौजूद है, फिर भी वे हाउस वाइफ का ऑपशन सेलेक्ट करती हैं ।
क्यों ? ….क्योंकि उनके लिए उनकी फैमिली , बच्चों की परवरिश, घर का माहौल या एक बेहतर शांत जीवन ज्यादा जरूरी हो सकता है।
क्या यह गलत है ? जी नही ।

अगर हम कहते हैं कि महिलाओं को अपनी पसंद की लाइफ चुनने की फ्रीडम होनी चाहिए, तो हमें यह भी एक्सेप्ट करना होगा कि घर संभालना भी एक अच्छा और सम्मानजनक ऑप्शन है ।
प्रॉब्लम तब पैदा होती है जब हम हर होममेकर को बेचारी घोषित कर देते हैं।
और दूसरी तरफ़ हर पुरुष को स्पेशल राइटस का सिम्बल।
दोनों ही कॉन्सेप्ट अधूरे हैं।
हम अक्सर धूप में खड़े आदमी को देखकर कहते हैं — ” यही तो उसका काम है, और क्या ।”
लेकिन क्या कभी सोचा कि शायद उसने भी कोई और जीवन चाहा होगा ?
शायद वह भी अपने बच्चों के साथ दोपहर बिताना चाहता हो। शायद वह भी एसी वाले कमरे में बैठकर काम करना चाहता हो।
लेकिन उसकी लाइफ ने उसे वह ऑपशन ही नहीं दिया। समाज में Equality की चर्चा बहुत ज़रूरी है।
लेकिन Equality का मतलब केवल राइट्स की बात करना नहीं है।
ड्यूटीज , जोखिम और जिम्मेदारियों की भी बात होनी चाहिए। आज ऑर्मी की सबसे पहली चौकियों पर, फ्रंट पर कौन खड़ा है?
माइनिंग सेक्टर में सबसे जोखिम भरे काम कौन कर रहा है ? समुद्र में महीनों जहाज़ पर कौन रहता है ?
सीवर में उतरकर जान जोखिम में कौन डालता है ?
इन सारे सवालों का मकसद किसी एक वर्ग को महान साबित करना नहीं है।
मरसद केवल इतना है कि मेहनत को भी उसका सम्मान मिले।
Equality या एक दूसरे से बराबरी का मतलब यह नहीं कि पुरुषों के स्ट्रगल गायब हो जाएँ।
और यह भी नहीं कि महिलाओं की चुनौतियों को कम करके आँका जाए। रियल बराबरी वहीं शुरू होती है जहाँ कम्पैरिजन खतम होती है।
जहाँ हम यह मान लेते हैं औऱ एकसेप्ट करते हैं कि दोनों के स्ट्रगल अलग अलग हैं।
दोनों के चैलेंज अलग हैं। दोनों के दबाव अलग हैं।
लेकिन दोनों सम्मान के हकदार हैं।

आज सोशल मीडिया का सबसे बड़ा संकट यही है कि वह हर सबजेक्ट को दो खेमों में बाँट देता है।
या तो पुरुष पूरी तरह दोषी हैं। या फिर महिलाएँ पूरी तरह गलत हैं।
जबकि रियल लाइफ इन दोनों एक्सट्रीम के बीच चलती है।
एक आदमी धूप में दिनभर मेहनत करके घर लौटता है। एक महिला पूरे दिन घर और बच्चों को संभालकर थक जाती है।
एक महिला रात की ड्यूटी पर अस्पताल में है। एक पुरुष रातभर हाईवे पर ट्रक चला रहा है।
दोनों अपने-अपने मोर्चे पर समाज को आगे बढ़ा रहे हैं।
इसलिए शायद अब समय आ गया है कि “मेल बनाम फीमेल” की बहस से आगे बढ़ा जाए। क्योंकि यह लड़ाई कभी थी ही नहीं।
यह दो विरोधी वर्ग नहीं हैं। यह एक ही समाज के दो पहिए हैं।
अगर एक की मेहनत दिखे और दूसरे की नहीं, तो समाज अधूरा रह जाएगा।
अगली बार जब आपकी बस किसी रेलवे क्रॉसिंग पर रुके और कोई पसीने से भीगा आदमी आपकी खिड़की पर चना, मूंगफली या पानी बेचता हुआ दिखाई दे, तो उसे केवल एक बेचनेवाला मत समझिए। वह शायद अपने घर की पूरी उम्मीद लेकर आपके सामने खड़ा है।
और जब किसी घर में एक अच्छी पढ़ी लिखी काबिल महिला अपनी फैमिली के साथ रहना चुनती है, तो उसके फैसले को भी बिना जाने केवल मजबूरी का नाम मत दीजिए।
हर जिंदगी के पीछे एक कहानी होती है। हर डिसीजन के पीछे कुछ सिचुएशन होती हैं।
हर struggle की अपनी धूप होती है। अपनी धूल होती है।
और शायद इसी का नाम है—ज़िंदगी।
इसलिए बहस “मेल बनाम फीमेल” की नहीं होनी चाहिए।
बहस इस बात की होनी चाहिए कि क्या हम इंसान की मेहनत को उसके Gender से ऊपर उठकर देख पा रहे हैं ?
जिस दिन हम ऐसा करने लगेंगे, उस दिन शायद धूप भी वही होगी, धूल भी वही होगी, लेकिन हमारी नज़र बदल चुकी होगी।