silent treatment
फराह ने अब पूरी तरह खुद को पोशीदा कर लिया था समर की नज़रों से ..पर वो खुद गाहे बेगाहे उसे देखती रहती ।
उसने साइलेंट ट्रीटमेंट का ही रास्ता चुना जो शायद अब उसकी मजबरी भी थी।
उसने सोच लिया था की अब चाहे जो हो.वो समर को और सफाइयां नहीं देगी ।अपने रिश्ते की दुहाई लेकर उसके सामने हरगिज़ नहीं खड़ी होगी । उसने ताल्लुक़ तो तर्क नहीं किया …पर ये सज़ा खुद के लिए तजवीज़ की थी उसने । समर से दूरी की।
अपनी ज़ात को समर के वजूद से अलहदा करके ।
वो सारा दिन शीनू के सिरहाने बैठती और सारी रात सजदे में उसके लिए दुआएं करती ..यही रूटीन बन गया था उसका।
धीरे धीरे दिन गुजर रहे थे.। और शीनू के ट्रीटमेंट का टाइमफ्रेम भी बढ़ रहा था। समर और फराह दोनों ही दिन रात बस अपने शीनू के वापस लौटने की उम्मीद में जी रहे थे, मगर एक दूसरे से अलग।
फराह ने तो जैसे तैसे समर की नफरत के आगे घुटने टेक दिए थे पर अब इतने दिन गुजरने के बाद समर की बेचैनी बढ़ने लगी थी । उसका ग़ुस्सा तो कब का काफूर हो चुका था ।अब उसकी नज़रें फराह को तलाशती । पर वो तो उसके सामने ही नहीं आती ।
उसकी कॉल्स भी नहीं लेती । कुछ जरूरी बात होती तो मेसेज से रिप्लाई कर देती । उसने तो अपनी आवाज भी समर के कानों तक नहीं जाने दी । हॉस्पिटल में भी उसके साये से दूर रहती । इतनी सख्ती से वो ये अमल करेगी ऐसा सोचा भी नहीं था समर ने ।
उसे देखे बग़ैर उससे बात किये बग़ैर 25 दिन गुज़र चुके थे ..और ऐसा उनकी सात साल की ज़िंदगी में कभी नहीं हुआ था ।
समर अब गिल्ट में आ रहा था। उसे बेचैनी और घबराहट होने लगी थी।
फराह ने उसे ऐसी सज़ा दी थी जिससे उसके होश ठिकाने आ गए थी ।ज़िंदगी के इस मुश्किल मोड़ पर भी वो उसके साथ चल तो रही थी पर उसकी नज़रों से दूर । पर वो तो अपनी हर खुशी हर ग़म में उसकी अटेंशन चाहता था । मगर उसने क्या किया उसके साथ ।
जिदंगी में आए इस मुशिकल वक्त का सारा इलज़ाम उस पर आयेद कर खुद को पाक बास साबित कर लिया । अपनी अदालत खुद लगाई , न कोई सफाई .. न कोई दलील .. और जज बनकर खुद ही फैसला सुना दिया । और एक लम्हे में उसे मुजरिम बना दिया जो वाक़ई में मुजरिम थी ही नहीं ।
वो जब अपनी पिछली हरकतों का सोचता तो उसका दिल हर बात में फराह की बेगुनाही की गवाही देता उसका ज़मीर मलामतें करता …ये सारे हादसे तो उनके नसीब में होने लिखे थे ..फिर अकेली फराह क्यों उसकी नफरत की आग में झुलसती रही …उसने उसे उस मोड़ पर तनहा कर दिया जब उसे उसकी शिद्दत से जरूरत थी .
.उसने तो निकाह के उन दो बोलों को निभा दिया पर वो अपने ऐतबार में कमज़ोर साबित रह गया …वो अपने दर्द की ही दुहाइयाँ देता रहा ..पर उसका ज़ख्म कहीं ज़्यादा था ..क्यूंकी उसके दिल और जिस्म दोनों ज़ख़्मी थे ।
समर अब पल पल अपने शीनू को देखता और फिर अपनी फराह को देखने के लिए तड़पता।
उस रोज़ भी जब उसने समर को आते देखा तो जल्दी से बाहर निकल आई …वो हमेशा सीढ़ियों से उतरती क्यूंकि समर लिफ्ट से ऊपर आता था ।
मगर उस रोज़ समर को ऑफिस की कोई कॉल आ गई और वो लिफ्ट में गया ही नहीं ..वही लाउन्ज में खड़ा बाते कर रहा था ।
तभी उसने फराह को सीढ़ियों से तेज़ क़दमों से आते देखा ।
वो उसकी तरफ दौड़ा था ,पर वो उसे देखकर भागने लगी ..और उसका पाँव फिसल गया .वो गिर पड़ी
समर तेज़ी से उसकी तरफ लपका और अपना हाथ दिया ।
पर वो वैसे ही अपनी जगह फ्रीज रही कोई रिएक्शन नहीं दिया उसने।
समर अब भी उसके सामने हाथ देकर खड़ा था।
क्या कर रही हो फराह , इतना ग़ुस्सा । देखो तो तुम्हें पैर में चोट आई है । पहले उठो मैंने कहा मेरा हाथ पकड़ों ।
फराह को वाकई चोट लगी थी ,वो किसी तरह समर का हाथ पकड़ कर खडे होने की कोशिश करने लगी ।
फिर जब वो खड़ी हुई , उसने उसका हाथ तो थामा मगर अगले ही पल समर का हाथ छुड़कर अपना चेहरा दूसरी तरफ कर के खड़ी रही ।
वो समझ गया था …अच्छा ठीक है
मुझे नहीं देखना चाहती हो तो मत देखो ….मगर मेरी बात तो सुन सकती हो ।
कहकर वो चुप हो गया था।वो जो इतने दिनों बाद उसे आज अपने सामने देख रहा था ,उसने भी कहां सोचा था कि ऐसा भी दिन आएगा कभी उसकी लाइफ में। वो खामोशी से बस अपनी तरफ पीठ घुमाए खड़ी फराह को चुपचाप देखता ही रहा।
समर की खामोशी अब फराह को चुभ रही थी। न वो पलट सकती थी और न उससे कुछ पूछ सकती थी। पर वो समर के आज अचानक इस तरह मिलने पर हैरान जरूर हुई थी। बीते कुछ हफ्तों में तो दोनों यही रूटीन फॉलो कर रहे थे ,बिना एक दूसरे से मिले सारी फॉरमैलिटीज पूरी कर रहे थे। फिर आज ये समर को क्या हुआ। कहीं शीनू के लिए तो डॉक्टर ने.. नहीं ..नही वो तो अभी मिलकर गए हैं मुझसे। फराह अपने ही ख्यालों में खोई थी, कि फिर से समर ने धीरे से उसका नाम लिया था।
फराह… एक मिनट बात कर सकती हो मुझसे ।उसने रिकवेस्ट वाले अंदाज में कहा था इस दफा।
फराह ने अब अपनी चुप्पी तोड़ी थी।
कहिये ..उसने वैसे ही अपनी बैक उसकी तरफ किये हुए जवाब दिया था।
समर फिर से उसके पीछे ही रूककर कहता है।
फराह .. एक बात कहूं , प्लीज सुनोगी न।
हम्म ..उसने हां में सर हिलाया था।
अब समर हकलाते हकलाते बोल रहा था।
क्या ..क्या तुम मुझे कभी माफ़ कर सकोगी इस जिंदगी में।
हालांकि मेरा जुर्म तो तुम्हारी माफी से कहीं ज़्यादा बड़ा है और उसके लिए इस तरह यूं चलते चलते सिर्फ माफी मांगना मुनासिब नहीं है । पर तुम मुझे माफ़ करो या न करो, ये मैं तुम पर छोड़ता हूं। लेकिन मुझे ऐतराफ़ तो करना है ।
I Know …फराह..
मैंने तुम्हे उस ग़लती का क़ुसूरवार बनाया जो तुमसे हुई ही नहीं थी। और आज मुझे ये Confession करना है तुमसे ।
हां फराह गलती न तुम्हारी थी न मेरी । फिर भी मैने तुम्हें मुजरिम बना डाला । औऱ.. और न जाने क्या क्या नहीं कह डाला तुम्हें जो कहते हुए मेरी जुबान जल जाती तो शायद अच्छा होता।
वो कह रहा था धीरे धीरे, अपने दिल का गुबार ,अपना गिल्ट उसके सामने निकाल रहा था। और फराह तो बस बुत बनकर वहीं खड़ी थी।उसकी आंखें फिर से गीली होने लगी थी, जिसे बार बार वो अपने दुपट्टे से साफ कर रही थी ताकि समर को फील न हो कि वो रो रही है।
समर अब एकदम से उसकी बैक से लगकर खड़ा था।फराह सिसक रही थी।
र्मुझे इस मुश्किल सफर में तुम्हारी ज़रूरत है । तुम मेरे बग़ैर बहादुरी से खड़ी हो ,मगर मैं तुम्हारे बिना कभी मुकम्मल नहीं ..न कल था ..ना आज ..और आइंदा इस जिंदगी में भी तुम्हारे बिना मुमकिन नहीं ।
मेरी मुस्कराहट ..मेरी खुशियां ..मेरे आंसू ..सब तुम ही से तो हैं.. तुम्ही ने तो हमारा घर बनाया है .और एक हादसे से मैंने ये सब फरामोश कर दिया ..ये भूल गया के मुझे तो ज़िंदगी के हर मोड़ पर तम्हारी ज़रूरत है ।
I need you …badly ,very badly , I Can’t live without you,
I love you farah..I love you..
प्लीज अब तो मेरी तरफ देख लो …और उसके दोनों बाज़ू पकड़कर उसे अपनी तरफ घुमाया था।
फराह धीरे से उसकी तरफ टर्न होती है मगर उसकी आँखें नम थी और पलकें झुकी हुई थीं ।
समर उसे देखते ही फिर से बोल पड़ा ।
एहसास नदामत में तो मैं हूँ, तुमने क्यों नज़रें झुकाई और उसका चेहरा अपनी तरफ उठाते हुए कहा ..
क्या मैं इतना बुरा हूँ ..की मुझे एक नज़र देखना गवारा नहीं अब तुम्हें । इतनी नफरत करने लगी हो मुझसे तुम अब कि मुझे फेस भी नहीं करना चाहती।
उसकी इस बात पर फराह बिफर पड़ी थी।
नहीं नहीं हरगिज नहीं समर.. समर । नफरत तो मैं आपसे मरते दम तक नहीं कर सकती । और वो हिचकियाँ लेने लगी । इतने दिनों के बाद आज पहली दफा उसका नाम लिया था।
तुमने ही तो कहा था , दूर होने को अपनी नजरों से ..बस इसलिए अपनी शकल नहीं दिखाई ।
अब वो उसके हाथ अपने हाथ में लेते हुए बोला ।
हाँ कहा था और अपने उसी बुरे अलफ़ाज़ की वजह से इतने दिन खामोश रहा चाहकर भी तुम्हारे सामने आने हौसला नहीं था मुझमें , वरना मेरे होश तो तभी ठिकाने आ गए थे, जब से तुमने मुझ से पर्दा कर लिया ।