Lost Childhood : बच्चे नही रहे मन के सच्चे..
बचपन खो गया या हमने छीन लिया……
“बचपन अब सिर्फ एक याद है, वो मासूमियत अब फोटो में दिखती है – हकीकत में नहीं।”
एक दौर था जब बच्चों को लेकर कहा जाता था – “बच्चे मन के सच्चे”। तब उनकी बातों में मासूमियत होती थी, आंखों में चमक होती थी, और हर छोटी चीज़ में वो दुनिया ढूंढ लिया करते थे।
मगर अब?
बच्चे नहीं रहे मन के सच्चे
अब वो कहावत, एक गुजरी कहानी जैसी लगने लगी है। आज का बच्चा 6 साल की उम में वो 6 का नहीं लगता, 10 का लगता है। जो अभी 10 का हो गया है वो अब टीनएजर्स की तरह मच्योर बिहेव करने लगा है .उसके चेहरे पर बचपन का नूर नहीं, बल्कि स्क्रीन की रोशनी है। औऱ इन टीनएजर्स बच्चों के तो कहने ही क्या वो तो अब जैसे एक स्मार्ट अडल्ट बन चुके है।
मोबाइल के स्मार्ट बच्चे – पर क्या सच में स्मार्ट?
क्या सारी गलती तेजी से बदलते इस सो कॉल्ड मॉडर्न लिविंग कल्चर और बच्चों के हाथ लगे उस मोबाइल की है.. जिसने उन्हें इस कच्ची उम्र में ही दुनिया की कई ऐसी चीजें दिखा दी जो अभी की डेट में उनकी उम्र के लिए थी ही नहीं. या फिर वक्त से पहले ही उन्हें वो सारी इनफॉर्मेशन भी मुहैया करा दी गई है जो उनके छोटे से दिमाग के लिए मिसफिट थी.
और नतीजा क्या हुआ बच्चे तो अब बच्चे रहे ही नहीं वो तो वक्त से पहले ही बड़े हो गए.
और बड़े भी हुए तो इस तरह कि अपने से बड़ों के ही वो नाक कान काटने लगे.
आज का हर बच्चा एक डिजिटल डिवाइस के साथ पैदा हो रहा है। मोबाइल, इंटरनेट, यूट्यूब और गेम्स उनके पहले दोस्त बन गए हैं।अब वो वही देखते हैं, जो स्क्रीन दिखाती है। वो वही बोलते हैं, जो उन्हें वर्चुअल दुनिया से सुनाई देता है।भोलेपन की जगह अब बड़ों जैसी बातें, सवाल और एटीट्यूड आ गया है। और आज की ये जेनरेशन इंसटेंट जेनरेशन बन गई जब बच्चों की मासूमियत स्मार्टफोन में गुम हो गई.
बच्चों की नई दुनिया – “इट्स माय लाइफ, माय चॉइस”
अब ज़्यादातर घरों में एक ही शिकायत है –
बच्चे अब पेरेंट्स की सुनते नहीं, जवाब देते हैं। मोबाइल, टीवी, सोशल मीडिया – सब उन्हें सिखाते हैं कि क्या पहनना है, क्या खाना है, क्या सोचना है।
अब पैरेंट्स “गाइड” नहीं, सिर्फ “स्पॉन्सर” बन कर रह गए हैं। वैसे तो आज की जेनरेशन के इन बच्चों को तो कई कटैगरी में बांट दिया गया है
मसलन Gen z के बाद अब Gen Alpha ..की भी आमद हो चुकी है.
मगर हो इनमें से कोई भी कटैगरी, बिहेवियर तो सबका एक जैसा ही है और धीरे धीरे सब तो सेल्फिश बनते जा रहे हैं .
इंस्टेंट ऐप्स – इमपेशंट बच्चे
दिनों दिन बढ़ती जा रही इन डिलीवरी एप्स की फौज ने न सिर्फ बड़ों को इमपेशेंट बनाया है.
बच्चों और टीनएजर्स को तो इन एप्स ने अपना टारगेट ही बना डाला है . जब इनके एड हमारी आपकी आंखों से गुजरते हैं तो उसका ज्यादातर कंटेंट तो अपनी टारगेट पॉपुलेशन पर ही फोकस रहता है.
फिर होता वही है… बच्चे हो जाते हैं इमपेशेंट और किसी भी बात के लिए छोटा सा भी कॉमप्रोमाइज नहीं कर पाते।फिर उनकी यही हैबिट उन्हे धीरे धीरे सेल्फिश बना देती है….अब तो वो सिर्फ ऑर्डर करना जानते है.

डिलीवरी ऐप्स और इंस्टेंट कल्चर ने बच्चों को ये सिखाया है कि जो चाहो, फौरन पाओ। अब इंतज़ार करना उन्हें आता ही नहीं।कोई चीज़ चाहिए? बस एक क्लिक।अगले 10 मिनट में डोरबेल बजेगी और प्रोडक्ट सामने होगा।इसी ने बच्चों को बनाया है – इम्पेशंट और सेल्फिश।
पैनडेमिक एरा और जेनरेशन गैप की गहराई
अब से महज 4-5 साल पहले जब ये दुनिया पैनडेमिक से लड़ रही थी और अभी की ये सो कॉल्ड सकसेसफुल कही जानेवीली जेनरेशन अपने आप को इस नए दौर में ढाल रही थी.
तब धीरे धीरे कुछ और भी बदल रहा था. एक तरफ जहां हमलोग अपने आप को रिलिवेंट और .अपडेट बनाए रखने के लिए खुद को बदल रहे थे. इस नए वर्क फ्रॉम होम कल्चर को अडॉप्ट करने के लिए दिन रात खुद को और ज्यादा टेकिनकली साउंड करने की कोशिश में थे.,
वहीं हमसे बाद वाली जेनरेशन तो एम.एस .टीम्स और जूम जैसे ऑनलाइन प्लैटफॉर्म पर आसानी से अपने स्कूल और कॉलेज के असाइनमेंट करने में बिजी थी.कोरोना ने जहां बड़ों को वर्क फ्रॉम होम में झोंक दिया, वहीं बच्चों को स्कूल से स्क्रीन तक पहुंचा दिया।MS Teams, Zoom, Google Classroom जैसे प्लेटफॉर्म पर छोटे बच्चों ने वो टेक्नोलॉजी सीख ली जो हम वेबिनार में भी समझ नहीं पाए।तभी तो उन्हें लगा – “हम भी अब बड़े हो गए। पेरेंट्स जैसा सबकुछ कर सकते हैं।”
यहीं से बचपन और बड़प्पन की लाइन क्रॉस हो गई।

पेरेंट्स की जिम्मेदारी है…
कई पेरेंट्स खुद उस संघर्ष से निकले हैं जहां बचपन में उन्हें बहुत कुछ त्यागना पड़ा। अब वो नहीं चाहते कि उनके बच्चों को वो झेलना पड़े।इसलिए वो बन गए ओवर-प्रोटेक्टिव,ओवर-पैम्परिंग,ओवर-स्पॉन्सरिंग पेरेंट्स
अब बच्चा कुछ मांगे, उससे पहले वो चीज़ सामने रख दी जाती है – ज़रूरत हो या न हो।
नतीजा: बच्चे सिर्फ मांगना सीख गए, समझना नहीं
अब बच्चा ये नहीं देखता कि पेरेंट्स उस चीज़ के लिए कितनी मेहनत कर रहे हैं।
उसे सिर्फ चाहिए – अब और अभी। उसे कुछ चाहिए तो वो पेरेंट को बस एक टूल समझकर सिर्फ अपनी डिमॉंड बता देता है और बस उसके पूरा होने की एकस्पेकटेशन रखता है।फिर धीरे धीरे उस तरह वो डिमॉंडिंग और इमपेशंट बनता चला जाता है..उसे ये ध्यान नहीं रहता कि जो कुछ भी उसने डिमॉंड की है वो उसके लिए जरूरी है भी या नहीं.
फिर अगर वो उसे नहीं मिला? तो शुरू हो जाता है – गुस्सा,लड़ाई और पेरेंट्स को गलत ठहराना
तब वही पेरेंट्स जो कल तक “कूल” थे, अब उन्हें “ऑउटडेटेड” और “रिजिड” लगने लगते हैं।
घर – अब बॉक्सिंग रिंग बनते जा रहे हैं
हर घर में अब एक जेनरेशन वॉर चल रही है –
एक तरफ बच्चे, जो मानते हैं कि वो सबकुछ जानते हैं।
दूसरी तरफ पेरेंट्स, जो सोचते हैं कि वो अब भी बेहतर गाइड बन सकते हैं।
सवाल ये नहीं कि कौन सही है –
सवाल ये है कि बचपन की मासूमियत क्या अब सच में खो चुकी है?
तो अब क्या करें? – कोई हल है या हम सब हारे हुए हैं?
नहीं, हल अभी भी है –बच्चों को समय दीजिए, स्क्रीन नहीं।
उन्हें मांगने से पहले सोचने की आदत डालिए।
- उनकी उम्र को समझिए, और उसे जीने का मौका दीजिए।
- और सबसे जरूरी – “कूल पेरेंट” बनने की बजाय “कनेक्टेड पेरेंट” बनिए।