Ulimited Internet : Mummy ka Paracetamol
“Unlimited Internet and Wifi : Mummy का पैरासिटामोल
मॉडर्न इंडिया में आज जहां जिंदगी इतनी आसान और फिक्सड हो गई है ।जैसे कि हवा में उड़ता हुआ कोई प्लेन ऑटो पॉयलट मोड पर चल रहा हो। इंडियन फैमिलीज चाहे वो अर्बन हों या रूरल सब जगह ये बदलाव देखने को मिल रहे हैं।
21वीं सदी का इंडिया, टेक्नोलॉजी से लैस, ग्लोबल अपॉर्च्युनिटीज से भरा और करियर-ड्रिवन जनरेशन से डेकोरेटेड — लेकिन इन सबके बीच कुछ ऐसा है जो लगातार छूटता जा रहा है।
कुछ ऐसा जो हमारे घरों में था, पर अब स्क्रीन के पीछे दब कर रह गया है। एक नई रियलिटी जो आधुनिक भारतीय समाज में चुपचाप घर कर गई है।
हम बात कर रहे हैं उस मां की, जो आजकल अपने वजूद से ज़्यादा अपने वाई-फाई सिग्नल में जी रही है।
बदलते रिश्तों की बदलती स्पीड
हमारे समाज में अब ये आम बात हो चली है कि बच्चे अपने ड्रीम्स के पीछे भागते हुए घर छोड़ते हैं।
किसी के बच्चे दिल्ली की किसी यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैं, किसी के बेटे न्यूयॉर्क की सबवे पकड़ रहे हैं, किसी की बेटी बैंगलोर में जॉब कर रही है, तो कोई सिंगापुर में सेटल हो गया है।
इन सबमें काफी एक्साइटमेंट है. जोश है । सबका अपने लिए अपनी उस नई लोकेशन के लिए जहां अब उनकी आनेवाले कुछ सालों की लाइफ गुजरनेवाली है।
इन सबके पीछे बस एक चीज पीछे छूट जाती है — “मां”। जो हर सुबह, हर शाम अब बस मोबाइल की स्क्रीन पर टिक टिकी लगाए बैठी रहती हैं।
सन्नाटे में लिपटा एक रिश्ता
एक मां जो कभी सुबह 5 बजे अलार्म लगाकर बच्चों का टिफिन तैयार करती थी, आज उसी वक्त फोन की स्क्रीन पर वॉट्सएप लास्ट सीन चेक कर रही है।
एक मां जो बच्चों के लिए भाग-भागकर ब्रेकफास्ट बनाती थी, आज वही मां सिर्फ उम्मीद के भरोसे हर आधे घंटे में फोन चेक करती है कि शायद आज बात हो जाए।
हर “शायद” अब उसकी जिंदगी का हिस्सा बन गया है।शायद वो फ्री होगा,शायद वो अभी घर पहुंचा होगा,शायद अब उसकी कॉल आएगी।पर वो कॉल शायद ही कभी आती है।
ऐसे न जाने कितने शायद अब उन फैमिलीज का हिस्सा बन चुके हैं जहां के परिंदे अपनी परवाज पर उड़ चुके हैं।ये खामोशी एक अजीब सी चुभन देती है। अब न सुबह 5 बजे के अलॉर्म लगते हैं और न दोपहर के 4 बजे की भागाभागी ही है। सब अपनी जगह पर वैसे का वैसा ही है।
जैसा आज सुबह था। जैसे बीती रात को था। जैसे बीते दिन था।
कोई चेंज नहीं है।

इंडियन फैमिलीज में जहां मां किसी एक रोल में कभी फिट ही नहीं होती।
वो तो एक जमाने में ऑल राउंडर होती है।घर में . बाहर में. सोसाइटी में. रिश्ते नाते में हर जगह सिर्फ वही तो होती है। वही तो सबकुछ इनिशियेट करती है और वही फिनिशिंग टच भी देती है।
उसके बिना तो कुछ भी नहीं चलता। घड़ी की सुइंयां एक मिनट के लिए रूक भी जाती हैं मगर वो तो बिना डिसचॉर्ज हुए नॉन स्टॉप परफॉर्म करती रहती है।
इंटरनेट: अब साथी, अब सहारा
औऱ एक दिन सडनली जब बच्चे अपने बैग पैक करने लगते हैं ।तो वो बस नंब हो जाती है।अब आगे क्या।पर एक चीज है जो उसके लिए कहीं हैं अवेलेबल वो भी ऑल द टाइम 24 बॉय 7 ।
वो है उसका अपना इंटरनेट।
अब मम्मी इंटरनेट का वो दरवाजा खोल देती है फिर कभी न बंद करने के लिए।
वही इंटरनेट जो कभी उसके लिए बच्चों के स्कूल प्रोजेक्ट्स ढूंढने का ज़रिया था।
आज वही इंटरनेट उसकी भावनात्मक व्हीलचेयर बन चुका है। पहले पहल तो रेसिपीज़ वीडियो से शुरुआत हुई, फिर फिर मोटिवेशनल स्पीच,फिर इंस्टा रील्स।उसके बाद फिर यूट्यूब वीडियोज़ और फिर धीरे-धीरे उनका हर सन्नाटा स्क्रॉलिंग में बदल जाता है।
और तो और वो बच्चों का पूरा टाइमटेबल भी फोन में सेव कर लेती हैं,किस दिन कौन सा इंटरव्यू है, कौन सी सेमिनार है.समय से पहले रिमाइंडर देना,हर अपडेट को नोट करना,वे सिर्फ इंटरनेट पर नहीं होतीं, वे बच्चों की डिजिटल जिंदगी से जुड़ने की हर संभव कोशिश कर रही होती हैं.अब वो सिर्फ ऑनलाइन नहीं, बल्कि हमेशा ऑनलाइन रहती हैं।
जब मां बन जाए “डिजिटल इनसाइडर” आज की माएं अब सिर्फ मदर नहीं हैं।वो वर्चुअल ऑब्जर्वर बन चुकी हैं।
आज की माएं अब सिर्फ मदर नहीं हैं।वो वर्चुअल ऑब्जर्वर बन चुकी हैं। हाल ही में हुए एक सर्वे के अकॉर्डिंग इंडिया में डेली इंटरनेट यूसेज के जो डेटा सामने आए हैं उसमें उन इंडियन वीमेन की परसेंटेज अलॉरमिंग है जिनकी एज ग्रुप 50 के आसपास या फिर उससे उपर है।
इस डेटा के मुताबिक , किसी फ्रेंड ग्रुप में साइलेंट मेंबर, फॅमिली व्हॉट्सएप ग्रुप में सबसे एक्टिव।वेब सीरीज़ की दुनिया से लेकर पॉडकास्ट के अलग-अलग टॉपिक तक, अब माएं अपने डिजिटल दुनिया में रम चुकी हैं।
वो अब रियल वर्ल्ड से ज्यादा डिजिटल टाइमलाइन से जुड़ी रहती हैं — बिलकुल उसी की तरह जैसे कभी वो बच्चों के स्कूल टाइमटेबल से जुड़ी रहती थीं।
डिजिटल अडिक्शन या इमोशनल रिकवरी?
क्या इसे हम इंटरनेट अडिक्शन कह सकते हैं?शायद नहीं।
क्योंकि वो तो मां है। और मां तो कभी ऐडिक्ट नहीं होती —वो तो हमेशा कनेक्टेड रहती है।
अपने बच्चों से।अपने मकसद से।अपने अधूरे संवाद से।

वो कॉल जो डिसकनेक्ट हो जाती है
जब मां का कॉल आता है, तो बच्चों की आवाज़ में जल्दी होती है।
“मॉम, अभी मीटिंग में हूं।”
“थोड़ा बाद में कॉल करता हूं।”
“अभी थोड़ी अर्जेंट कॉल है।”
कई बार अर्जेंसी होती नहीं है,
पर मां हर बार मान लेती है।फिर एक और कॉल कट जाती है…
और वो वापस लौट जाती है अपनी ब्लू स्क्रीन की दुनिया में।
इंटरनेट का रोल—मेडिसिन या एडिक्शन?
इंटरनेट अब टाइम पास नहीं, जीवन का सहारा है।
व्हाट्सएप फॉरवर्ड्स से लेकर फिटनेस वीडियो तक,इंस्टा रील्स से लेकर बिंज वॉचिंग तक।
हर एक्टिविटी दरअसल उस खालीपन को भरने की कोशिश है।
ये एक खामोश बगावत है जो हर घर में चल रही है ये खामोशी हर घर में है
ये सिर्फ एक मां की कहानी नहीं है।ये हर उस घर की कहानी है जो मॉडर्न इंडिया का हिस्सा बन चुका है।
जहां माएं अब अनदेखी खिड़की से बच्चों की दुनिया को झांक रही हैं।अब न वो दोपहर की थकान है, न वो शाम की चाय का इंतज़ार।हर दिन वैसा ही बीतता है जैसे पिछला।
सब कुछ स्थिर है, लेकिन मां के भीतर बहुत कुछ हिल रहा है।
इंटरनेट – अब पैरासिटामोल है
ये इंटरनेट एडिक्शन नहीं, ये हीलिंग है। इंटरनेट अब उस मां के लिए वैसा ही है जैसा पैरासिटामोल किसी सिरदर्द के लिए — फौरी राहत देने वाला दोस्त।
इंटरनेट अब उस मां की थकान का इलाज है,जब दिल में खालीपन हो,जब आंखें नम हों,जब बच्चों की आवाज़ की तड़प सताए,तो वही इंटरनेट उसे थाम लेता है,बिलकुल पैरासिटामोल की तरह।
एक अलार्म जो हर घर में बज रहा है ये कहानी सिर्फ किसी एक मिडिल क्लास घर की नहीं। ये मेट्रो सिटी से लेकर गांव तक फैली सच्चाई है। एक साइलेंट पैंडेमिक जिसे हम सब देख कर भी अनदेखा कर रहे हैं।

अगली बार कॉल डिसकनेक्ट मत करना
हम जब भी अपनी व्यस्तता में होते हैं,
तो भूल जाते हैं कि कोई है जो दिन भर खालीपन में भी बस हमारी ही टाइमलाइन को फॉलो कर रहा है।मां कोई जरूरत नहीं होती,वो तो लाइफलाइन होती है।वो हमसे बहुत कुछ नहीं मांगती —
बस एक कुछ मिनट की बातचीत।तो अगली बार जब मां का कॉल आए,
तो डिसकनेक्ट मत करना।क्योंकि अब वो सिर्फ तुम्हारी मां नहीं,
वो अपने इंटरनेट अफेयर में लिपटी हुई एक इंतज़ार करती हुई तुम्हारी बिछड़ी हुई दोस्त है।
अपनी मां से आज ही बात करें। बिना किसी कारण के। बिना किसी जल्दबाज़ी के। क्योंकि उनके पास अब सिर्फ एक ही साथी है — इंटरनेट। लेकिन वो तुम्हारे साथ को नहीं भूल पाई हैं।
अगली बार जब उनकी आए, तो उसे एक *रुटीन कॉल* की तरह नहीं, एक भावनात्मक इन्विटेशन की तरह लें। “क्योंकि अब उन्हें साथी मिल गया है — अनलिमिटेड इंटरनेट: मम्मी का पैरासिटामोल।” अभी कॉल करें। बात करें। उन्हें बताएं कि आप अब भी वहीं हैं — और उसी नेटवर्क में।