Kichen,Cooking & Millenial Women
Kitchen & Cooking से क्यूं दूर हो रही हैं Millenial Women
जब भी यह बात होती है कि ” आज की Millennial Women पहले की महिलाओं की तरह खाना बनाना पसंद नहीं करतीं Kitchen & Cooking से भाग रही हैं “, तो अक्सर जजमेंट बहुत जल्दी निकाल लिया जाता है। कोई कहता है कि Modern Life-Style इसकी वजह है, कोई कहता है कि Working Women के पास टाइम नहीं है, और कुछ लोग तो यह भी मान लेते हैं कि नई जेनरेशन घर-परिवार के संस्कार भूल गई है।
लेकिन क्या सचमुच यही पूरी सच्चाई है ?
शायद नहीं।
सच्चाई कहीं ज्यादा गहरी और परेशान करने वाली है।
असल प्रॉब्लम खाना बनाने में नहीं है। परेशानी उस सोशल मेंटलिटी में है जिसने एक जेनरेशन से दूसरी जेनरेशन तक औरतों के लेबर को प्यार का नाम देकर उसका इवैल्यूएशन करना ही छोड़ दिया।
एक टाइम था जब किचन सिर्फ घर का एक कमरा नहीं था । उसे सारे घर का दिल माना जाता था। चूल्हे की आँच में केवल खाना नहीं पकता था, घर -परिवार के रिश्ते भी पकते थे। माँ और दादी अपने हाथों से रोटियाँ बनाते वक्त उनमें सिर्फ आटा और पानी नहीं, बल्कि अपना प्यार और सैक्रीफाइस भी गूँथती थीं।
उनके लिए खाना बनाना बस एक काम नहीं, बल्कि अपनी फैमिली के लिए प्यार लुटाने का सबसे आसान और सबसे खूबसूरत मीडियम था।
लेकिन प्यार तभी तक जिंदा रहता है , जब तक उसका रेस्पेक्ट किया जाए।

रेस्पेक्ट खतम होते ही वही प्यार धीरे-धीरे बोझ बन जाता है।
आज की मिलेनियल वुमन अपनी माँ और दादी की पूरी ज़िंदगी देख चुकी है। उसने देखा कि कैसे वे सुबह सबसे पहले उठती थीं और रात में सबसे बाद में सोती थीं। पूरी फैमिली का पेट भरने के बाद अक्सर वे खुद सबसे आखिर में खाना खाती थीं। उन्होंने सालों दर सालों तक बिना किसी शिकायत के घर की सेवा की।
लेकिन बदले में उन्हें क्या मिला ?
क्या किसी ने उनके काम फाइनेंशियल वैल्यू कैलकुलेट की ?
क्या किसी ने उनके इस हर दिन के इनविजिबल लेबर को प्रोफेशन जितना रेस्पेक्ट दिया ?
क्या किसी ने रोज़ यह कहा कि “आज आपने हमारे लिए इतना किया, थैक्यू सो मच ” ?
बहुत कम।
आज भी ज्यादातर हाउस होल्ड्स में खाना बनाना सिर्फ उस घर की लेडी की ड्यूटी मानी जाती है । जब किसी काम को ड्यूटी मान लिया जाता है, तब उसके पीछे की मेहनत दिखाई देना बंद हो जाती है।
आज भी यही हो रहा है।

सुबह की चाय, बच्चों का टिफिन, हस्बेंड का नाश्ता, घर के बुज़ुर्गों की मेडिसिन के हिसाब से डाइट , दोपहर का खाना, शाम की चाय, रात का खाना —यह सब सिर्फ हाथों का काम नहीं है। इसके पीछे लगातार चलने वाला एक मेंटल लेबर भी होता है। किसके लिए क्या बनाना है, क्या खत्म हो गया है, बाज़ार से क्या लाना है, किसकी तबीयत कैसी है, किसे क्या पसंद है—इन सबका हिसाब अक्सर एक घर की लेडी ही अपने मन में रखती है।
फिर भी जब फैमिली खाने की मेज़ पर बैठती है , तो उस मेहनत का ज्यादातर हिस्सा इनविजिबल ही रहता है।
घर के मेल मेंबर आराम से अपना लंच डिनर करते हैं। बच्चों की प्लेट सज जाती है। घर में आए गेस्ट खाने के टेस्ट की चर्चा करते हैं। लेकिन शायद ही कोई यह पूछता है कि आज किचन में कितने घंटे लगे होंगे।
कितनी बार गर्म तेल के छींटे पड़े होंगे।
कितनी बार पसीना आँखों में गया होगा।
कितनी बार खुद की थकान छिपाकर मुस्कुराते हुए खाना सर्व गया होगा।
और सबसे तकलीफदेह बात यह है कि कई बार थैंक्स देने के बजाय सबसे पहले शिकायत शुरू हो जाती है।
“दाल में नमक कम है।”
“चावल थोड़ा कच्चा रह गया।”
“सब्ज़ी में मसाला कम है।”
“आज पहले जैसा जायका नहीं आया।”
सोचिए, कई घंटों की मेहनत का जजमेंट सिर्फ एक चम्मच नमक से कर दिया जाता है।
किसी कलाकार की पूरी पेंटिंग देखकर अगर किसी एक छोटी सी लाइन की गलती बताई जाए, तो उसे कैसा लगेगा?
फिर किचन में हर दिन अपना टाइम , एनर्जी और फीलिंग्स लगाने वाली वो औरत कैसा महसूस करती होगी ?
यही वजह है कि धीरे-धीरे खाना बनाना उसके लिए मजा नहीं , सजा बन जाता है।
फेस्टिवल के टाइम यह प्रेशर कई गुना बढ़ जाता है।
हमारी सोसाइटी में त्योहार खुशियों का सिम्बल माने जाते हैं। लेकिन हजारों महिलाओं के लिए त्योहार का मायने होता है—लगातार कई दिनों की तैयारी, घंटों तक किचन में खड़े रहना, तरह तरह की रेसिपीज बनाना, मिठाइयाँ तैयार करना, मेहमानों की देख-रेख करना और आखिर में सबसे बाद में खुद बैठकर खाना खाना।

कई घरों में लेडीज फेस्टिवल से पहले और फेस्टिवल वाले दिन मिलाकर पंद्रह से अठारह घंटे तक लगातार काम करती हैं।
सारी गहमा गहमी खतम हो जाती है। मेहमान लौट जाते हैं।
सब लोग सेलिब्रेशन की खुशी याद रखते हैं।
लेकिन उस लेडी की थकान किसी की मेमरीज का हिस्सा नहीं बनती।
क्या यह हैरत की बात है कि नई जेनरेशन की महिलाएँ इस सिस्टम पर सवाल उठा रही हैं ?
वे यह नहीं कह रही हैं कि उन्हें खाना बनाना पसंद नहीं।
वे बस इतना पूछ रही हैं—
अगर यह फैमिली का काम है, तो पूरी फैमिली इसमें हिस्सा क्यों नहीं लेती ?
अगर यही प्यार का पैमाना है, तो प्यार सिर्फ एक ही इंसान क्यों निभाए ?
अगर स्वाद सबको चाहिए, तो मेहनत भी सबकी क्यों नहीं होनी चाहिए?
यह बगावत नहीं है।
यह इक्यूअलिटी की माँग है।
और इस सबजेक्ट का दूसरा पहलू यह है कि खाना बनाना शायद दुनिया का इकलौता ऐसा काम है जिसकी मौजूदगी पर कम, लेकिन उसकी गैर-मौजूदगी पर सबसे ज़्यादा ध्यान दिया जाता है।
जब रोज़ टाइम पर नाश्ता, दोपहर का खाना और रात का खाना मेज़ पर पहुँच जाता है, तो किसी को यह ख़याल भी नहीं आता कि उसके पीछे कितने घंटों की मेहनत, कितनी प्लानिंग, कितना पेशेंस और कितनी मोहब्बत लगी है।
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लेकिन जिस दिन किसी वजह से घर की लेडी खाना न बना पाए, उसी दिन सबसे पहला सवाल उठता है—
“आज खाना नहीं बना?”
“क्या हुआ?”
“आज खाने का क्या इंतज़ाम है?”
यानी खाना बनने तक किचन का सारा काम जैसे दिखाई ही नहीं देता। लेकिन उसके रुकते ही उसकी अहमियत सबको याद आ जाती है।
यही तो इस मेहनत की सबसे बड़ी परेशानी है।
किचन में किया गया हॉर्ड वर्क और लेबर तब तक इनविजिबल रहता है, जब तक वह लगातार चलता रहता है।
यह काम हर दिन, बिना छुट्टी, बिना बोनस, बिना प्रमोशन और बिना तालियों के किया जाता है। सुबह की पहली चाय से लेकर रात के आख़िरी बर्तन तक, एक औरत का दिन हमेशा उसके किचन के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। लेकिन इस सफ़र को बहुत कम लोग देखते हैं।

लोग सिर्फ़ खाने की थाली देखते हैं। उस थाली तक पहुँचने का रास्ता नहीं।
उन्हें गरम रोटी दिखाई देती है।लेकिन उस रोटी के लिए गरम तवे के सामने बिताया गया वक़्त दिखाई नहीं देता।
उन्हें दाल का स्वाद महसूस होता है।लेकिन उस स्वाद के लिए कितनी बार मसाले चखे गए, यह महसूस नहीं होता।
घर के लोग अक्सर पूछते हैं—“आज खाने में क्या बना है?”
लेकिन बहुत कम लोग पूछते हैं—“आज खाना बनाने में तुम्हें कितनी मेहनत लगी?”
यही फ़र्क़ एक काम को इबादत से बोझ बना देता है।
मोहब्बत से किया गया काम भी तब थका देता है, जब उसे अपना हक़—यानी सम्मान—न मिले।
सच तो यह है कि रसोई में सिर्फ़ खाना नहीं पकता। वहाँ किसी का समय पकता है।किसी की ताक़त खर्च होती है।
आज दुनिया भर में ऐसे फैमिलीज बढ़ रही हैं जहाँ Husband-Wife दोनों खाना बनाते हैं। बच्चे भी अपनी उम्र के अनुसार छोटे-छोटे काम करते हैं। कोई सब्ज़ियाँ काटता है, कोई मेज़ लगाता है, कोई बर्तन समेटता है।
ऐसे घरों में kitchen किसी एक इंसान का बोझ नहीं होता।
वह पूरी फैमिली का कॉमन स्पेस बन जाता है।
और यही वह बदलाव है जिसकी आज सबसे ज्यादा जरूरत है।
महिलाओं को सिर्फ मदद नहीं चाहिए। उन्हें रेस्पेक्ट चाहिए।
उन्हें यह महसूस होना चाहिए कि उनके इस इनविजिबल लेबर को अब देखा जा रहा है।
कभी एक सच्चा “थैक्स “, कभी बिना शिकायत के खाना खाना, कभी यह कहना—”आज तुम बैठो, मैं सर्व कर देता हूँ”, या “आज खाना हम दोनों मिलकर बनाएँगे”—ये छोटे-छोटे बदलाव किसी भी महंगे गिफ्ट से ज्यादा कीमती हो सकते हैं।
हमें यह भी समझना होगा कि जायका बस मसालों से नहीं आता।
टेस्ट उस इंसान की मेंटल स्टेट से भी आता है जो खाना बना रहा है।
जिस किचन में सिर्फ Expectations हों और सराहा न जाए , वहाँ धीरे-धीरे प्यार कम होने लगता है।
और जहाँ रेस्पेक्ट, भागीदारी और अपनापन हो, वहाँ आम सी दाल-रोटी भी मन जैसी लगती है।
इसलिए यह कहना कि “आज की महिलाएँ खाना बनाना पसंद नहीं करतीं” रियलिटी का आधा हिस्सा है।
सच यह है कि वे आज भी अपने परिवार के लिए प्यार से खाना बनाना चाहती हैं।
लेकिन वे यह भी चाहती हैं कि उनके प्यार को एक नैचुरल ड्यूटी मानकर अनदेखा न किया जाए।
वे चाहती हैं कि उनकी थाली में भी इज्जत आए।
जिस दिन हमारी सोसाइटी यह समझ जाएगी कि किचन में सिर्फ ब्रेकफास्ट,लंच और डिनर ही नहीं पकता , बल्कि किसी औरत का टाइम, लेबर , पेशेंस, और प्यार भी होता है, उसी दिन खाना बनाना फिर से मजा बन जाएगा।
और जिस दिन किचन में औरतों की मेहनत का सही recognition मिलने लगेगा, उसी दिन खाने का जायका भी बदलेगा, घरों का माहौल भी बदलेगा और रिश्तों की गर्माहट भी लौट आएगी।
शायद तब अगली पीढ़ी यह नहीं पूछेगी कि ” Millenial Women खाना बनाना क्यों छोड़ रही हैं ? “
