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What’s Wrong With That...मतलब कभी-कभी कुछ बातें इतनी आम हो जाती हैं कि हम उन पर सवाल ही नहीं करते। जैसे — “मैंने तो बस कह दिया…” “भाई, कहने में हर्ज क्या है?” ये लफ्ज सुनने में मामूली औऱ हल्के लगते हैं। एक दम आम सी रोज़मर्रा की बातचीत हो जैसे। पर क्या हमने कभी रुककर सोचा है कि इसका असर किसी और पर क्या होता है ।अगर ज़रा ठहर कर देखें, तो यही बातें उस इंसेसेटिविटी की जड़ बन चुकी हैं,जो हम सबके अदर कहीं न कहीं घर कर चुकी है।
क्या वाकई कहने में कोई हर्ज नहीं है ?
हम जब किसी से कुछ कहते हैं — कोई Comment , कोई Suggestion , कोई तंज या कोई ‘सीधी सच्ची बात’ — तो क्या हम एक पल के लिए भी सोचते हैं कि उस इंसान पर उस का क्या असर होगा ? जवाब ज़्यादातर बार “नहीं” होता है।क्योंकि कई दफा हम मान चुके हैं कि हमें सब कहने का हक है। और हमने अपनी ‘सच बोलने की आदत’ को एक ढाल बना लिया है।
और उस ढाल के पीछे छुपी होती है हमारी नाराज़गी, Criticism , या कभी-कभी सिर्फ एक जजमेंटल सोच।
” मैं तो सच बोलता हूँ ” — या फिर सिर्फ ‘ छुपा हुआ हमला ‘ !!
जब आप कहते हैं —
“तुम्हारा पहनावा ठीक नहीं लग रहा।”
“इतनी उम्र में ये सब?”
“तुम्हारा वजन कुछ ज़्यादा नहीं हो गया?”
“शादी नहीं की अभी तक?”
“तुम मर्द हो कर रोते हो?”
“लड़की हो, ज़रा ढंग से बैठो…”

तो क्या आप सच बोल रहे हैं — या फिर उस ‘सच’ के नाम पर किसी के Self respect , Identity , आजादी या इमोशंस पर हमला कर रहे हैं ? हमने सीधे तौर पर क्रिटिसिज्म् को एक आदत बना लिया है ।
बोलने की आज़ादी और सोचने की ज़िम्मेदारी
हमें बोलने की आज़ादी है — और बिल्कुल होनी भी चाहिए।
लेकिन क्या कभी इस पर भी गौर किया है कि बोलने से पहले सोचने की ज़िम्मेदारी भी उतनी ही ज़रूरी है । मगर हमे किसी को चोट देने की आज़ादी नहीं होती ।हर इंसान एक कहानी है। हर चेहरे के पीछे Struggle छुपा है, और हर मुस्कान के पीछे कोई दर्द भी। शब्द हल्के होते हैं, पर असर भारी। कभी तारीफ़ बनते हैं, तो कभी किसी के वजूद पर चुभने वाला तीर।“इसलिए यह मान लेना कि आपके शब्दों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा — एक वहम है।”
“तो अगली बार जब आप कहें — ‘कहने में हर्ज क्या है?’ — तो खुद से एक बार ज़रूर पूछिए, कि कहीं आपके कहने से किसी और को कुछ ‘महसूस’ तो नहीं हो रहा?”
“कहने में हर्ज क्या है?”
ये सिर्फ एक लाइन नहीं, एक सोच है।ऐसी सोच, जो कहने से पहले सोचती नहीं —
कि सामने वाला क्या महसूस करेगा,उसे बुरा लगेगा या नहीं,वो चुप रहेगा या अंदर ही अंदर टूट जाएगा।
हम क्यों नहीं रुकते एक पल ?क्यों नहीं सोचते कि हमारी कही हुई बात किसी के दिल पर क्या असर छोड़ सकती है ?
मगर इससे हमें क्या फर्क पड़ता है — क्योंकि हमें तो बस कह देना है वो जो हमें ‘गलत’ लगता है,जो हमारी नज़र को नहीं भाता।
और जब सोसाइटी ने हमेशा से हर बात को ट्रेडिशन, वैल्यूज,या फिर ‘चार लोग क्या कहेंगे’ के नाम पर जायज़ ठहराया है,तो हम भी वही करते हैं — कह देते हैं, टोक देते हैं, जज कर देते हैं।
” जी हां सच में कहने में हर्ज है ! “
अगर वो बात किसी को चोट पहुंचाए,अगर वो लफ्ज किसी को सवालों में घेर दे,
अगर वो कमेंट किसी की चुप्पी के पीछे चीख बन जाए।कभी-कभी हम Double Standrds की चादर ओढ़ लेते हैं,ऐसे बोलते हैं जैसे हमने तो बस ‘सच्चाई’ कही हो । पर हकीकत ये है —हमने अपने लफ्जों को एक कवर दे दिया और उसे ‘सीधा-सपाट’ कहकर खुद को पाक-साफ भी बना लिया। पर जो सुन रहा था,उसका क्या?क्या उसे कोई हक़ नहीं कि वो भी महसूस करे ?
क्या उसकी चुप्पी हमारी बेबाकी को सही ठहराती है ?
हर बात कह देना,हर बात टोक देना,हर बार जज कर देना —सिर्फ इसलिए कि “कहने में हर्ज क्या है”,
ये सिर्फ आज़ादी नहीं —कभी-कभी ये हमारी इंसेंसेटिविटी की निशानी होती है।हमने इस बिना सोचे समझे कहनेवाले बिहेवियर को एक आदत बना लिया है ।बिना समझे, बिना महसूस किए।क्योंकि सोसाइटी ने हमें सिखाया है कि “जो सही लगे, कह दो।”
और जब कभी कोई बात सामनेवाले को चुभ जाए, तो कह दो — “अरे यार, मज़ाक था। माइंड क्यों कर रहे हो?”

हमारे बोलने का मतलब कई बार हमारी पर्सनल सोच नहीं होती ,बल्कि वो होती हैं जो ‘चार लोग’ सोच सकते हैं।ट्रेडिशन, वैल्यूज़, dignity — इन सब के पीछे हम अपनी असहजता, Insecurity और पुराने खांचे ढोते रहते हैं। और जब कोई इंसान इन बने-बनाए दायरे को तोड़ने की कोशिश करता है,तो हम सबसे पहले वही करते हैं जो हमें पीढ़ियों से सिखाया गया है:
कमेंट। क्रिटिसिज्म। टोका-टोकी। और इस सबके बाद,
हमारी सफाई होती है — “कहने में हर्ज क्या है?”
किसी को आप क्या कह रहे हैं, ये सिर्फ कुछ लफ्ज नहीं होते —वो किसी के इमोशंस को उनकी फीलिंग्स छू सकते हैं,तोड़ सकते हैं,
या फिर अंदर तक चुभ सकते हैं।इसलिए यह मान लेना कि आप जो कह रहे हैं, उसका कोई असर नहीं पड़ेगा,एक तरह की नासमझी और कभी-कभी Immaturity होती है।
क्या कहने से पहले एक पल रुकना इतना मुश्किल है ?
क्या कहने से पहले यह सोच लेना इतना मुशिकल है कि — सामने वाला इसे सुनकर आहत हो सकता है? क्या ये बात मैं दूसरे तरीके से, और अधिक सम्मानजनक तरीके से कह सकता हूँ ? क्या सच में ये बोलना ज़रूरी है, या सिर्फ मेरे मन की फांस है जलन है ?अगर इन सवालों के जवाब में आपको थोड़ी भी झिझक महसूस हो,तो शायद वो बात कहने की नहीं, समझने की जरूरत है।

कहने में हर्ज तब नहीं होता,
जब कहने में Respect , sensitivity, और सचाई के साथ-साथ नरमी हो।
पर जब कुछ बातें सिर्फ तोड़ने, घाव देने, या जज करने के लिए कही जाएँ, तो फिर कहने में सिर्फ हर्ज ही नहीं,
कभी-कभी नुकसान भी हो सकता है।
इसलिए अगली बार जब आप किसी से कुछ कहने जाएं — तो ज़रा रुकिए, सोचिए…
क्योंकि हर बात कह देने में शायद आपको हर्ज न लगे, पर जिसे आप कह रहे हैं, उसके लिए वो चुभनेवाली हो सकती है।
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