Over thinking ..A slow poison
OverThinking : Slow Poison; ओवर थिंकिंग वो स्लो पॉयज़न जो इंसान को बाहर से नहीं, अंदर से खत्म करता है…
“यार, मैंने ऐसा क्यों बोल दिया?”
“अगर मैंने ये फैसला गलत ले लिया तो?”
“लोग मेरे बारे में क्या सोच रहे होंगे?”
“काश मैंने उस दिन ऐसा किया होता…”
अगर ये बातें आपको अपनी लगती हैं, तो हो सकता है कि आप भी ओवरथिंकिंग के शिकार हों।
आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में हर इंसान किसी न किसी टेंशन से गुजर रहा है। किसी को जॉब की फिक्र है, किसी को बिज़नेस की, किसी को अपने बिगड़ते रिश्तों की, तो किसी को अपने बच्चों के फ्यूचर की। लेकिन असली प्रॉब्लम टेंशन नहीं है , बल्कि उस टेंशन को बार-बार अपने माइंड में रिपीट करना है। यही हैबिट धीरे-धीरे इंसान की खुशी, सुकून और सेहत को खा जाती है। इसलिए ओवरथिंकिंग को “स्लो पॉइज़न” कहा जाता है।
ये ऐसा ज़हर है जो एक दिन में असर नहीं दिखाता, लेकिन धीरे-धीरे इंसान की मुसकुराहट, सेल्फ-कॉंफिंडेंस , नींद और सेहत सब कुछ छीन लेता है।
ज़िंदगी की छोटी-छोटी बातें, लेकिन दिमाग में बड़ा तूफान
सोचिए…अगर ऑफिस में बॉस ने थोड़ा सख्त लहजे में बात कर दी ,कोई डेडलाइन कम्पलीट नही हो सकी तो काम खत्म होने के बाद भी आप पूरे रास्ते यही सोचते रहे कि शायद मेरी नौकरी खतरे में है।
घर में हस्बेंड- वाइफ ने बात नही की या कोई अनबन हो गई तो और ज्यादा बात बिगड़ गई फिर फौरन से दिमाग ने कहानी बना दी—”शायद अब प्यार नहीं रहा… शायद ये रिश्ता अब एक बोझ है ”
किसी फ्रेंड ने मैसेज देखा लेकिन रिप्लाई नहीं किया, न ही टाइम पर कॉल पिक करी , मगर किसी दूसरे से बात भी कर रहा और उसके टच में भी है ,तो एकदम से दिल ने फैसला सुना दिया—”अब उसे मेरी जरूरत नहीं रही, उसकी नया फ्रेंड सर्कल बन चुका है “
सोशल मीडिया पर आपकी पोस्ट पर कम लाइक्स आए। फिर से दिमाग ने कहना शुरू कर दिया—”शायद लोग मुझे पसंद नहीं करते।”
रियलिटी की रोशनी में इनमें से ज़्यादातर बातें सच नहीं होतीं। लेकिन हमारा माइंड बिना सबूत के अपनी कहानियाँ बनाना शुरू कर देता है। यही ओवरथिंकिंग है।
ओवरथिंकिंग आखिर होती क्यों है ?

अक्सर इसकी जड़ में कुछ बातें होती हैं —
- हर चीज़ को परफेक्ट करने की आदत।
- हर किसी को खुश रखने की कोशिश।
- फ्यूचर का ज़रूरत से ज़्यादा डर।
- पुराने कड़वे तजुर्बे।
- खुद पर भरोसे की कमी।
- दूसरों से लगातार अपना कम्पैरिजन करना।
यानी प्रॉब्लम बाहर कम और हमारे सोचने के तरीके में ज़्यादा होती है।
जब माइंड कभी “ऑफ” ही नहीं होता
हमारा माइंड भी बॉडी के बाकी ऑर्गैन की तरह आराम चाहता है। लेकिन ओवरथिंकिंग करने वाला इंसान सोते वक्त भी सोचता रहता है।
बिस्तर पर लेटते ही…”कल क्या होगा?”
“अगर ये नहीं हुआ तो? “उसने ऐसा क्यों कहा?”
“काश मैं ऐसा बोल देता…” और देखते-देखते रात के दो या तीन बज जाते हैं।
सुबह उठते ही अब माइंड थका हुआ, आंखें भारी और मूड खराब। धीरे-धीरे ये सिर्फ नींद की नहीं, पूरी लाइफस्टाइल की परेशानी बन जाती है।
ओवरथिंकिंग और नींद का गहरा रिश्ता
Sleep Mode 8 hours : Body की Battery फिर भी low
नींद सिर्फ आराम नहीं, बल्कि बॉडी की रिपेयरिंग का टाइम होती है।जब इंसान लगातार सोचता रहता है, तो दिमाग आराम की जगह अलर्ट मोड में रहता है। ऐसे में अच्छी नींद नहीं आती।कम नींद का असर क्या होता है ?
- सुबह सिर भारी रहना।पूरे दिन आलस।
- छोटी-छोटी बात पर गुस्सा।ध्यान न लगना।
- काम में गलतियाँ बढ़ना।याददाश्त कमजोर होना।
यानी एक ओवरथिंकिंग की आदत पूरी दिनचर्या बिगाड़ देती है।

स्ट्रेस हार्मोन – छुपा हुआ दुश्मन
जब हम लगातार चिंता करते हैं, तो बॉडी में कॉर्टिसोल नाम का स्ट्रेस हार्मोन बढ़ जाता है।
थोड़ी देर के लिए इसका बढ़ना कॉमन है, लेकिन अगर यह लंबे समय तक बढ़ा रहे, तो इसका असर पूरे शरीर पर पड़ सकता है।
जैसे—
- ब्लड प्रेशर बढ़ना।
- ब्लड शुगर अफेक्ट होना।
- वजन बढ़ना या घटना।
- बार-बार थकान महसूस होना।
- इम्यूनिटी कमजोर होना।
यानी जो बात सिर्फ दिमाग में शुरू हुई थी, वह अब पूरी बॉडी तक पहुंच जाती है।
बार-बार बीमार पड़ना भी एक सिग्नल है
कई लोग कहते हैं— “पता नहीं क्यों, हर महीने सर्दी-जुकाम हो जाता है।””हमेशा कमजोरी रहती है।””बॉडी में एनर्जी ही नहीं रहती।”
अगर इसके पीछे कोई मेडिकल रीजन नहीं मिल रहा, तो लगातार स्ट्रेस और ओवरथिंकिंग भी एक वजह हो सकती है।क्योंकि टेंशन का असर हमारे इम्यून सिस्टम पर भी पड़ता है।
औरतों पर साइडइफेक्ट :
औरतें अक्सर घर, नौकरी, बच्चों, परिवार और रिश्तों की जिम्मेदारियों के बीच खुद को सबसे आखिर में रख देती हैं।जब हर वक्त माइंड जिम्मेदारियों में उलझा रहता है, तो टेंशन बढ़ता जाता है।लगातार मेंटल स्ट्रेस से—
- पीरियड्स Irregular हो सकते हैं।
- हार्मोनल इमबैलेंस बढ़ सकता है।
- PCOD जैसी परेशानी और सीरियस महसूस हो सकती हैं।
- मूड स्विंग्स बढ़ सकते हैं।

इसलिए मेंटल हेल्थ का ध्यान रखना औरतों के लिए भी उतना ही जरूरी है जितना कि इनकी फिजिकल हेल्थ .
फैसले लेने की ताकत खत्म होने लगती है, Poor decision making
ओवरथिंकिंग का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इंसान डिसीजन मेकिंग से डरने लगता है।हर फैसले से पहले — “अगर नुकसान हो गया तो?” “अगर लोग हंसेंगे तो?” “अगर मैं फेल हो गया तो?” और इसी सोच में सामने से आ रहे कई मौके भी निकल जाते हैं।
याद रखिए— गलत फैसला लेना, कोई फैसला न लेने से बेहतर होता है।
क्योंकि गलतियों से इंसान सीखता है, लेकिन डर से सिर्फ पछतावा मिलता है।
रिश्तों का सबसे बड़ा दुश्मन
ओवरथिंकिंग सिर्फ इंसान को नहीं, उसके रिश्तों को भी कमजोर करती है।
कई बार सामने वाले ने कुछ कहा ही नहीं होता, लेकिन हम उसके लहजे, चेहरे और चुप्पी का अलग ही मतलब निकाल लेते हैं।
फिर मन में नाराज़गी शुरू। बात करना कम।दूरी बढ़ना।और धीरे-धीरे रिश्ता कमजोर।जबकि असलियत कुछ और होती है।
इसलिए हर बात का मतलब निकालने से बेहतर है कि जरूरत पड़ने पर सीधे पूछ लिया जाए।
सोशल मीडिया ने भी बढ़ाई परेशानी
Social Media : Life ऑनलाइन चले या ऑफलाइन; जिंदगी जिएं या Follow करें..
आज हर किसी की जिंदगी मोबाइल में है।दूसरों की ट्रैवल फोटो।नई कार।
नई नौकरी।महंगी शॉपिंग।खुशहाल फैमिली।सब देखकर लगता है—
“सबकी जिंदगी परफेक्ट है… बस मेरी नहीं।”लेकिन सच ये है कि सोशल मीडिया पर लोग अपनी हाइलाइट्स दिखाते हैं, पूरी जिंदगी नहीं।
अपनी असली जिंदगी की बराबरी किसी की चुनी हुई तस्वीरों से करना खुद के साथ और अपने रिश्तों के साथ नाइंसाफी है।
ओवरथिंकिंग और सेल्फ – कॉंफिंडेंस
जब इंसान हर बात में अपनी गलती ढूंढने लगता है, तो धीरे-धीरे उसका सेल्फ-कॉंफिंडेंस खत्म होने लगता है।
वह खुद पर भरोसा करना छोड़ देता है।हर काम से पहले डर।हर बात में शक।
हर फैसले में हां-ना .. कशमकश ,टालमटोल।और यही चीज़ इंसान की ग्रोथ रोक देती है।
इससे बाहर कैसे निकलें ?
ओवरथिंकिंग को पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं, लेकिन इसे काफी हद तक कम किया जा सकता है।
कुछ छोटी लेकिन असरदार आदतें अपनाइए—
पहली आदत: हर बात का जवाब उसी वक्त मत खोजिए। कुछ सवालों का जवाब वक्त देता है।
दूसरी आदत: जो आपके कंट्रोल में है, उसी पर फोकस कीजिए। जो आपके हाथ में नहीं, उसे बार-बार सोचने से कुछ नहीं बदलेगा।
तीसरी आदत: अपने थॉट्स लिखना शुरू करें । जब बातें कागज़ पर उतरती हैं, तो दिमाग हल्का महसूस करता है।
चौथी आदत: रोज़ कम से कम 30 मिनट वॉक या हल्की एक्सरसाइज कीजिए। बॉडी जितनी एक्टिव रहेगी, माइंड उतना पीसफुल रहेगा।
पांचवीं आदत: सोने से पहले मोबाइल और सोशल मीडिया से थोड़ा दूरी बनाइए।
छठी आदत: किसी भरोसेमंद फ्रेंड, फैमिली – मेंबर या ज़रूरत हो तो मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट से खुलकर बात करें । मदद मांगना कमजोरी नहीं, समझदारी है।
एक छोटी सी कहानी एक बुज़ुर्ग से किसी ने पूछा—
“आप इतने खुश कैसे रहते हैं?”उन्होंने मुस्कुराकर जवाब दिया— “जो बदल सकता हूं, उसे बदल देता हूं। जो नहीं बदल सकता, उसे अल्लाह पर छोड़ देता हूं।” बस यही सुकून की असली चाभी है।हम अक्सर उन बातों पर अपनी पूरी ताकत खर्च कर देते हैं, जिन पर हमारा कोई बस ही नहीं होता।
याद रखिए…हर सोच जरूरी नहीं होती।
हर डर सच नहीं होता।हर पॉसिबिलिटी रियलिटी नहीं बनती।और हर गलती जिंदगी खत्म नहीं करती।
ज़िंदगी का मकसद हर सवाल का जवाब ढूंढना नहीं, बल्कि सुकून के साथ जीना भी है।अगर आपका दिमाग हर वक्त अपने गुजरे हुए कल के अफसोस और फ्यूचर की फिक्र में उलझा रहेगा, तो आज की खूबसूरत ज़िंदगी हाथ से निकल जाएगी।

इसलिए खुद से एक वादा कीजिए—
कम सोचेंगे… ज़्यादा जिएंगे।
कम डरेंगे… ज़्यादा कोशिश करेंगे।
कम पछताएंगे… ज़्यादा मुस्कुराएंगे।
क्योंकि…
ओवरथिंकिंग धीरे-धीरे इंसान को कमजोर करती है, लेकिन उम्मीद, भरोसा और सही सोच उसे फिर से मजबूत बना सकती है।
अपने दिल और दिमाग को थोड़ा आराम दीजिए… क्योंकि सुकून भी जिंदगी की सबसे बड़ी दौलत है।