Pen -Paper -Disappear
कागज.कलम दवात लो औऱ फिर लिख लो कुछ काम का.
क्या सच में अब कागज कलम से आप और हम अपने दिन भर के काम काज में सच में काम का कुछ लिखते हैं क्या …
जरा सोचकर देखें क्या पेन और पेपर अब हमारी लाइफ में वैसे ही मौजूद हैं जैसे कुछ साल पहले हुआ करते थे. जैसे कुछ एक साल पहले उनके बिना बाहर निकलना मुमकिन नहीं होता था कि पता नहीं कब कहां कुछ नोट करने की जरूरत पड़ जाए.
जी हां…कभी कहा जाता था — “क़लम की ताक़त तलवार से ज़्यादा होती है”, और यह कहना हर लिहाज़ से सही भी था। क़लम यानी पेन और काग़ज़ का रिश्ता हमारी सोच, हमारे विचार और हमारी भावनाओं से सीधा जुड़ा होता था। लेकिन अब जब दुनिया डिजिटल हो चुकी है, तो ये क़लम और काग़ज़ भी कहीं पीछे छूटते जा रहे हैं।
रोजमर्रा की ज़िंदगी में पेन की जगह
अब सोचिए, क्या आपने हाल ही में किसी को रास्ते में चलते वक्त पेन मांगते देखा है? शायद नहीं। और अगर किसी ने आपसे पेन मांगा भी, तो क्या आपके पास था? ज़्यादातर जवाब होगा — “नहीं”।
कभी जेब में पेन रखना आम आदत थी, चाहे आप स्टूडेंट हों, नौकरीपेशा हों या फिर कोई दुकानदार। लेकिन अब? जेब में पेन रखने की आदत मानो बीते ज़माने की बात हो गई हो।

घर से गायब होती स्टेशनरी
आजकल के घरों में अगर आप किसी अलमारी या दराज में झांकें, तो पेन, पेंसिल, रबर, स्केल जैसे सामान बहुत कम ही मिलते हैं। ये सब कुछ अब “बच्चों की चीज़ें” बन कर रह गए हैं। स्कूल और कॉलेज के टीचर्स और उस प्रोफेशन से जुडे दूसरे कुछ लोगों के सिवाए ज्यादातर अब स्कूल कॉलेज के स्टूडेंटस ही अब पेन और काग़ज़ का उपयोग करते हैं, वो भी केवल तब तक जब तक उनका एजुकेशन से वास्ता है। पढ़ाई पूरी होते ही पेन और कागज़ से नाता भी धीरे-धीरे खत्म होता चला जाता है।
डिजिटल दुनिया का बोलबाला
मोबाइल, लैपटॉप, टैबलेट, स्मार्टवॉच — इन सभी गैजेट्स ने हमारी ज़िंदगी में इस कदर अंदर घर कर लिया है कि अब कोई भी चीज़ “लिखने” की ज़रूरत महसूस ही नहीं होती।
- नोट बनाना है? फोन में ऐप है।
- लिस्ट बनानी है? गूगल कीप है।
- चिट्ठी लिखनी है? अब ईमेल और वॉट्सऐप है।
- सवालों के जवाब देने हैं? चैटबॉट्स और गूगल है।
इसी वजह से अब लोगों के हाथों से लिखावट भी छिनती जा रही है। यहाँ तक कि कई बार तो लोग अपने ही सिगनेचर करना भूल जाते हैं, क्योंकि उन्हें अब लिखने की आदत ही नहीं रही। कई बार तो बैंक और दूसरी जरूरी जगहों पर अपने ही किए सिग्नेचर मैच करने में प्रॉबलम आने लगती है.क्यूंकि ज्यादातर लिखावट से जुड़ा काम कोई कर ही नहीं रहा. हर कोई जैसे ही कुछ याद रखने लायक बात फील करता है या उसे कोई कुछ नोट करने को कहता है तो फौरन से उसके हाथ में पड़ा फोन उपर आ जाता है और वो जरूरी डिटेल्स अपने फोन या लैपटॉप में फीड कर लेता है.
अब तो हालत ये है कि शायद एक ही फैमिली में रहनेवाले लोग एक दूसरे की हैंडराइटिंग नहीं पहचान पाते क्यूंकि वो घर बाहर कभी कुछ लिखते ही नहीं जब तक कि वो उनके प्रोफेशन से जुड़ा हुआ न हो.

स्कूलों में बचा आख़िरी अस्तित्व
अगर पेन और कागज़ का अस्तित्व अभी भी कहीं बचा है, तो वह हैं स्कूल और कॉलेज।
बच्चों को आज भी लिखना सिखाया जाता है, कॉपियाँ आज भी खरीदी जाती हैं, उनके सारे स्कूल एगजॉम्स् और बोर्ड एग्ज़ाम आज भी हाथ से लिखे जाते हैं। लेकिन जिस तरह से एजुकेशन का डिजिटलाइजेशन हो रहा है — ऑनलाइन क्लासेस, टाइपिंग असाइनमेंट्स, ई-बुक्स ज्यादातर स्कूल प्रोजेक्टस के पीपीटी प्रेजेंटेंशंस होने लगे हैं — उससे तो ये भी लगता है कि आने वाले समय में शायद यहां से भी कागज़ और पेन की ज़रूरत धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी।
भावनाओं की भाषा थी कलम
पेन सिर्फ लिखने का महज मीडियम या कोई टूल नहीं था, यह दिल से आ रही इमोशनल फीलिंग्स को दिखाने का माध्यम भी था।
- पहले पहल लव लेटर्स पेन से लिखे जाते थे।
- डायरियाँ पेन से भरी जाती थीं।
- नोटबुक्स में सपने और विचार दर्ज होते थे।
- माँ की रसोई में कोई पुरानी रेसिपी किसी फटे-पुराने कागज़ पर पड़ी रहती थी।
इन सबका एक अलग ही जादू था। टाइप की गई बातों में वो “फील” नहीं आता, जो हाथ से लिखी चीज़ों में होता है।
तो क्या सच में अब पेन की ज़रूरत नहीं रही?
ज़रूरत तो है, पर अब “अचानक पड़ने वाली” ज़रूरत बनकर रह गई है।
जैसे:
- कोई फॉर्म भरना हो और अचानक पेन चाहिए।
- किसी को जल्दी से कुछ नोट करना हो।
- कोई सिगनेचर करना हो।
और उस वक़्त अक्सर हमें लगता है कि काश हमारे पास पेन होता। यही वजह है कि अब अगर किसी से आप पेन मांगें, तो बहुत संभव है कि उसके पास न हो। वो भी चौंककर अपनी जेब टटोलता है, इधर-उधर देखता है, और फिर मायूस होकर कहता है — “अरे नहीं है यार, अब तो मैं भी नहीं रखता”।
भविष्य की पीढ़ियों के लिए सब टचस्क्रीन
अब की पीढ़ी “स्क्रीन” पर उंगलियाँ घुमाकर सब कुछ कर लेती है। उन्हें हाथ से लिखने में धीरे-धीरे कठिनाई होने लगी है।
- हेंडराइटिंग बिगड़ रही है।
- सोचने से पहले टाइप करने की आदत हो रही है।
- और भावनाएं इमोजी में बदल गई हैं।

फिर आखिर क्या पेन और कागज़ लौटेंगे?
कभी-कभी हम सब nostalgia में लौटते हैं — पुराने खत पढ़ते हैं, पुरानी डायरी उठाते हैं और उस स्याही की खुशबू महसूस करते हैं।
पेन और कागज़ का दौर शायद पूरी तरह खत्म न हो, लेकिन अब ये रोज़मर्रा की चीज़ नहीं रहे। ये अब एक “विशेष प्रयोजन” की चीज़ बन चुके हैं — जैसे त्यौहारों में निकाले जाने वाले पारंपरिक बर्तन।
अगर हमें अगली पीढ़ियों को हाथ से लिखना सिखाना है, तो शायद हमें फिर से अपने घरों में एक डिब्बा रखना पड़े — जिसमें कुछ पेन, एक डायरी, और थोड़े कागज़ हों। क्योंकि लिखना केवल एक आदत नहीं, एक कला है — और हर कला को ज़िंदा रखना हमारा ही काम है।