Male Supremacy in Indian Society
कैसे …..इंडियन सोसाइटी में रिलेशनशिप्स के अंदर छुपी है मेल सुप्रीमेसी ……..
इंडिया एक ऐसा देश है जहां एक तरफ मॉडर्न लाइफ है तो दूसरी तरफ डीप रूटेड ट्रेडिशन्स यानि जहां मॉडर्न सिस्टम और ट्रेडिशन दोनों एक साथ चलते हैं, वहाँ सोशल कल्चर की परतों को समझना आसान नहीं होता. बाहर से देखो तो लगेगा। कि आज लड़कियां और लड़के बराबर चल रहे हैं
एजुकेशन ,जॉब, पॉलिटिक्स स्पोर्ट्स हर जगह वुमन का इन्वॉल्वमेंट बढ़ रहा है
बाहरी दुनिया में तो तकरीबन हर तरफ जेंडर इकवॉलिटी की तस्वीर साफ तौर पर दिखाई दे रही है
लेकिन अगर ज़रा हम इस तस्वीर के भीतर झांकें — यानी उन ‘अंदरूनी’ और निजी जगहों में जाएँ जहाँ फैमिली, रिलेशनशिप और इमोशंस बसते हैं — तो हमें साफ तौर पर दिखाई देता है कि वहाँ आज भी मेल डॉमिनेंस ही बागडोर संभाले हुए है। मतलब घर के अंदर के रिश्तों के इमोशनल कनेक्शंस में आज भी खामोशी से एक मर्दाना निजाम चला आ रहा है.
है। यह एक ऐसी व्यवस्था बन गई है जो अब “नज़र” नहीं आती, बल्कि “महसूस” होती है .
अब की मेल डॉमिनेंस सॉफ्ट हो गई है पर गई नहीं
आज की मर्दाना सोच पुराने जमाने जैसी कहीं सीधे तौर पर सोसाइटी में दिखती नहीं । न ही यह अपनी ताकत से समाज पर शासन करती है. कहीं कोई जोर जबरदस्ती नहीं औऱ न ही कोई दिखावा।मगर अब यह इन्विजिबल पावर की तरह है जो चुपचाप बहती है यानि खामोशी से हमारी सोच, इमोशन और डिसिज़न को कंट्रोल करती है। अक्सर इतनी नॉर्मल और स्वाभाविक लगती है कि इसके होने पर सवाल भी नहीं उठते.
रिश्तों की चुप दुनिया में मेल डॉमिनेंस की धीमी लेकिन गहरी मौजूदगी

इंडिया में अगर हम आज की दुनिया को देखें, तो हर तरफ़ बदलाव दिखाई देता है। लड़कियाँ पढ़ रही हैं, नौकरी कर रही हैं, अपने फैसले खुद ले रही हैं। ऐसा लगता है कि अब महिलाएं और पुरुष बराबरी में जी रहे हैं। लेकिन जब हम ज़रा गहराई से सोचते हैं — घर के भीतर झांकते हैं, तो एक अलग ही सच्चाई सामने आती है।
समानता की सतही परत और भीतर की असमानता यानि बाहर बराबरी अन्दर इन्क्वालिटी
आज की तारीख में हम चाहे जितनी भी प्रगति की बात कर लें, यह सच्चाई अनदेखी नहीं की जा सकती कि चाहे गांव हो या शहर ज्यादातर घरों में डिसीजन मेकिंग का कंट्रोल आदमियों के पास ही होता है। और ये सिर्फ फैशन या काम से रिलेटेड नहीं बल्कि रिलेशनशिप्स और फीलिंग तक एक्सटेंड करता है जैसे कि वर्किंग वुमन जो पूरे दिनों फिर संभालती है घर आकर भी किचेन , बच्चों की केयर बाकी फैमिली मेंबर्स का ध्यान रखना ये सब कुछ अपने फर्ज के नाम पर करती हैं। सोसायटी उसे कहती है ये सब उसका प्यार और जिम्मेदारी है।
अंतरंग रिश्तों में मेल डॉमिनेंस की चुपचाप पकड़
पुरूश प्रधान सोच का सबसे अधिक असर उन रिश्तों में देखा जा सकता है जो बाहरी दुनिया से नहीं, बल्कि घर की चारदीवारी के भीतर सांस लेते हैं — जैसे पति-पत्नी का रिश्ता पेरेंटस और बच्चों के बीच रिश्ते या फिर लव रिलेशनशिप।

इन सारी रिलेशनशिप में आमतौर पर नैचुरली ही मर्द को हेड माना जाता है उसकी फीलिंग मैटर करती है.औऱ रिश्ते को बचाने की जिम्मेदारी हमेशा औरत को दी जाती है। यदि पति नाराज़ हो जाए, तो पत्नी को ‘समझदारी’ दिखानी चाहिए; यदि ससुराल वाले ताने मारें, तो बहू को ‘संयम’ रखना चाहिए।
यह वह जगह है जहाँ ये मेल सुप्रीमेसी चुपचाप शासन करती है — न कोई जोर-जबरदस्ती, न कोई कानूनी दबाव — बस कल्चर, ट्रेडिशन और इमोशनल इंटेलिजेंस के नाम पर नारी को एक खास दायरे में रखा जाता है। धीमे धीमे चुप रहकर चलती है ये पावर की पॉलिटिक्स
ये जो साइलेंट पॉलिटिक्स है इसमें कोई ओपन कमांड नहीं होता बस सिस्टम ऐसा बना दिया गया है की मर्द की बात को ही अहम और जरूरी समझा जाता है .
प्यार में भी बराबरी नहीं
हम सोचते हैं कि प्यार में सब कुछ बराबर होता है — लेकिन हमारे समाज में प्यार भी पैट्रियॉर्की ढांचे में बुना है. कहने का मतलब है कि
लव रिलेशनशिप में भी ज्यादातर मेल पॉर्टनर की फीलिंग और डिसीजन डॉमिनेट करते हैं। अगर ईगो एंड इनसिक्योरिटी की फीलिंग आए तो रिश्ते का डायरेक्शन मेल पार्टनर के हिसाब से बदल जाता है और औरत से एक्सपेक्ट किया जाता है कि वही कॉम्प्रोमाइज करें ताकि रिलेशनशिप टिका रहे। ये इमोशनल ओवर प्रेशर भी सोसाइटी में मेल डॉमिनेंस को ही सामने लेकर आता है.
आजकल मर्द ज़ोर से नहीं बोलते, लेकिन फिर भी उनकी बात सबसे ऊपर मानी जाती है। यह कोई खुला आदेश नहीं होता, बल्कि एक “स्वाभाविक नियम” की तरह काम करता है।
क्या चेंज पॉसिबल है ये जो शांत और इनविजिबल सिस्टम लगातार चल रहा है। ये एकदम डीपुली रूटेड है। सालों पुरानी मानसिकता का नियंत्रण इतना गहरा है कि यह मर्दाना सोच हर कोने में खुद-ब-खुद काम करती है।
मेल डॉमिनेंस की यह ‘शांत और सजग सत्ता’ इतनी आसानी से नहीं टूटेगी, क्योंकि यह हमारे संस्कारों, कहानियों, रीति-रिवाज़ों और यहाँ तक कि भाषा में भी रच-बस चुकी है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई बदलाव संभव नहीं।
औऱ ये चेंज तभी आएगा जब हम अपने पर्सनल रिलेशनशिप में पावर डायनेमिक्स को समझना स्टार्ट करेंगे। जब हम यह स्वीकार करें कि स्त्रियाँ केवल त्याग और सहनशीलता की मूर्ति नहीं हैं, बल्कि वे भी अपने जीवन की निर्णयकर्ता हो सकती हैं।

रिश्ते में भी बराबरी जरूरी है ये बात समझना बहुत जरूरी है कि इंडिया में मेल डॉमिनेंस सिर्फ सोशल या लीगल सिस्टम तक लिमिटेड नहीं है। ये हमारे सबसे क्लोज रिलेशनशिप में जिंदा है ये दिखाई नहीं देती। लेकिन हर पल महसूस होती है। अगर हमें रियल इक्वालिटी चाहिए तो रिश्ते ,इमोशन्स और घर के अंदर भी बराबरी लानी होगी। और ये तभी होगा जब हम सदियों से चले आ रहे इनके इनविजिबल पावर को पहचानें और उसे चैलेंज करने की हिम्मत करें जो किसी तूफ़ान की तरह नहीं चलती, बल्कि एक शांत, सतत और अव्यक्त प्रवाह की तरह समाज की नसों में दौड़ती रहती है।
जब तक हम इसे पहचानेंगे नहीं, तब तक हम इससे मुक्त भी नहीं हो सकते। समानता केवल नौकरी और कानून में नहीं, बल्कि रिश्तों में भी चाहिए — और वह तभी आएगी जब हम मेल सुप्रीमेसी के इस अनदेखे पावर सिस्टम को तोड़ने का साहस करेंगे।
मेल डॉमिनेंस कोई बड़ी चीख नहीं है — वह एक धीमा, पर गहरा साया है। और जब तक हम उसे पहचानते नहीं, तब तक उससे मुक्त होना मुश्किल है।
बराबरी सिर्फ़ दफ़्तर या कोर्ट में नहीं — रिश्तों में भी होनी चाहिए।